नई दिल्ली। फैसलाबाद में कैथोलिक डायोसीज़ द्वारा बिशप एंड्रियास रहमत के नेतृत्व में एक विरोध मार्च आयोजित किया गया। यह प्रदर्शन अल्पसंख्यक लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए किया गया। पाकिस्तान में नाबालिग लड़कियों के कथित अपहरण, ज़बरदस्ती शादी, ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन और दुर्व्यवहार के चिंताजनक मामलों की ओर ध्यान आकर्षित करना था। इस प्रदर्शन का मकसद कमज़ोर अल्पसंख्यक बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर जताई जा रही चिंताओं को ज़ोरदार ढंग से उठाना था। इस मार्च के माध्यम से संदेश देते हुए बताया गया कि एक नाबालिग लड़की पत्नी नहीं होती और धर्म परिवर्तन ज़बरदस्ती नहीं कराया जा सकता।
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प्रतिभागियों ने अल्पसंख्यक समुदायों से ताल्लुक रखने वाली नाबालिग लड़कियों की गरिमा, स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया। इस सभा में पादरी, शिक्षक, छात्र, युवा कार्यकर्ता, महिला प्रतिनिधि और अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए नागरिक समाज के सदस्यों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने बैनर और तख्तियां हाथों में ले रखी थीं, जिनमें बाल संरक्षण कानूनों को और सख्ती से लागू करने और ऐसे कथित अपराधों में शामिल लोगों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई थी। भीड़ को संबोधित करते हुए बिशप रहमत ने इस बात पर प्रकाश डाला कि नाबालिग लड़कियां समाज में सबसे ज़्यादा जोखिम वाले समूहों में से एक हैं और उन्हें तत्काल तथा बिना किसी समझौते के सुरक्षा की आवश्यकता है। उन्होंने ज़बरदस्ती शादी और धर्म परिवर्तन की निंदा करते हुए इन्हें मानवीय गरिमा, कानूनी मानदंडों और मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया। बिशप ने कहा कि ज़बरदस्ती, डर या धमकी के ज़रिए ली गई किसी भी तरह की सहमति की कोई कानूनी या नैतिक वैधता नहीं होती।