नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संस्थापक सदस्य व पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री और ‘मार्गदर्शक मंडल’ के सदस्य डॉ. मुरली मनोहर जोशी (Dr. Murli Manohar Joshi) ने नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi Government) की शिक्षा नीति, बजट और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। हिंदी दैनिक ‘अमर उजाला’ को दिए इंटरव्यू में जोशी ने मोदी सरकार की शिक्षा नीति और उसकी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने शिक्षा के बजट में कमी, सरकारी स्कूलों के बंद होने, शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, पेपर लीक और व्यापक भ्रष्टाचार को लेकर सरकार और व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था की नीतिगत प्राथमिकताओं और उसकी दिशा पर भी तीखी टिप्पणी की है।
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डॉ. मुरली मनोहर जोशी (Dr. Murli Manohar Joshi) ने पेपर लीक समस्या को केवल परीक्षा व्यवस्था की खामी मानने के बजाय समाज और शासन में बढ़ते भ्रष्टाचार से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि जब लोगों को हर जगह पैसे और भ्रष्टाचार का बोलबाला दिखाई देता है, तो वे भी गलत रास्ते को अपनाने लगते हैं और इसके लिए मूल रूप से सरकार और व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
पेपर लीक का रास्ता हमने ही बनाया है और फिर आप पूछते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है? अगर शिक्षा अर्थकारी नहीं है तो वह क्या शिक्षा है?
पेपर लीक (Paper Leaks) की मूल वजह क्या है? इस सवाल पर जोशी ने कहा कि इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह तय ही नहीं है कि शिक्षा के क्षेत्र में हमें जाना कहां है? जोशी ने कहा कि शिक्षा को रोजगार से जोड़ना जरूरी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा अर्थकारी होनी चाहिए। अगर शिक्षा अर्थकारी नहीं है तो वह क्या शिक्षा है?’ जोशी ने कहा कि आज की स्थिति यह है कि दिल्ली में एमए पास व्यक्ति नगर निगम में नौकरी कर रहा है और पीएचडी डिग्रीधारी नगर निगम के दफ्तर में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे एक बार यह देखकर बहुत तकलीफ हुई कि एक सफाई कर्मचारी बीएड था। वह ठेके पर 25-30 हजार रुपये की नौकरी कर रहा था। तो यह कहां जा रहा है मामला?
जोशी ने कहा कि एक तरफ कॉलेज खोले जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ यह नहीं देखा जा रहा कि वहां से पढ़कर निकलने वाले युवाओं के लिए नौकरियां कहां हैं? उनके मुताबिक, सुरक्षित नौकरी तो सरकारी नौकरी है, जिसमें जीवन के अंत तक की सुरक्षा तय है। उन्होंने कहा कि जब मैं पढ़ता था तो हमारे यहां सबसे ज्यादा लोग एडमिशन लेने के लिए फिजिक्स में आते थे। फिर दस बरस बाद लोग आने लगे इलेक्ट्रॉनिक्स में और फिर 15 बरस बाद लोग आने लगे इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में।
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उन्होंने कहा कि आपको देखना पड़ेगा कि आपकी योजना क्या है? लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे? तो जो जाना होगा, उधर जाएंगे। जोशी ने पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार को समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए कहा कि जब व्यवस्था में ही गलत रास्ते खुल जाते हैं तो छात्रों से ईमानदारी की उम्मीद करना मुश्किल है।
जब आपने घपले का रास्ता खोल दिया और उसके बाद आप कह रहे हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है?
उन्होंने कहा,कि जब यह होता है, तो घपला होगा ही होगा। फिर आदमी यह देखता है। कहते हैं कि अगर कोई घूस लेकर ठेका प्राप्त कर रहा है, तो मैं अब आवेदन पास नहीं कर सकता और फिर जब वह यह देखता है कि जब मेरा अध्यापक घूस लेकर बना है, तो फिर मैं क्यों नहीं पास कर सकता? जोशी ने कहा कि जब मंत्री और उसके ऊपर आरोप लग रहे हैं, जब न्यायपालिका में लोगों पर आरोप लग रहे हैं, तो वह कहता है कि यह रास्ता तो यही है। अब आपने रास्ता खोल दिया और उसके बाद आप कह रहे हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है?
उन्होंने कहा कि तो हमने ही यह रास्ता बनाया है। यह उन बच्चों का कसूर नहीं है। यह कसूर तो हमारा है। जोशी ने अपने कार्यकाल की तुलना मौजूदा स्थिति से करते हुए कहा कि मैं बहुत विनम्रता से कहता हूं, वाजपेयी जी के जमाने में पेपर लीक क्यों नहीं हुआ? उन्होंने कहा कि उस समय बुनियादी चीजों पर ध्यान दिया जा रहा था। जोशी ने कहा कि अब तो बैंक में घोटाले हो रहे हैं, तो फिर शिक्षा में भी घोटाले होंगे। व्यापार में घोटाले हो रहे हैं। सरकार घोटाले खुद कर रही है। फिर आप इस बेचारे [छात्र] को क्यों दोष दे रहे हो? वह तो करेगा ही।
जोशी ने इसे व्यापक सामाजिक ढांचे से जोड़ते हुए कहा कि आपको बुनियादी तौर पर देखना होगा कि समाज में आपने तय किया है, जो समाज का ढांचा आपने बना दिया है, वह इसलिए बनाया है कि आपने इसको मटेरियल गेन के लिए बना दिया है। उन्होंने कहा कि ‘समाज का उद्देश्य आपने ही रखा कि पैसा होना चाहिए, आपको हर कोई धनवान बनना चाहिए। वह दूसरे की जेब काटकर भी बन सकते हैं।
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‘परीक्षा न हो गई, युद्ध हो गया’
पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के प्रदर्शन और सरकार की तैयारियों पर सवाल के जवाब में जोशी ने इसे केंद्रीकरण की देन बताया। उन्होंने कहा कि यह मान लिया गया है कि हर समस्या का समाधान एक ही जगह से होगा। उन्होंने कहा कि अब कोशिश यह हो रही है कि पर्चे कैसे बनाए जाएं ताकि वे लीक न हों, फिर जहां पर्चे बन रहे हैं वहां से छपकर कैसे जाएं? उनकी सुरक्षा के लिए फौज कैसे लगाई जाए? हवाई जहाज कैसे आए? यह बताते हुए जोशी हंसने लगे और कहा कि भाई, कमाल है। परीक्षा न हो गई, युद्ध हो गया।
शिक्षा बजट की प्राथमिकता क्या है?
शिक्षा के बजट और सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर भी जोशी ने सवाल उठाए। उनसे पूछा गया कि आम बजट में शिक्षा पर होने वाला खर्च अब भी कम रहता है और क्या सरकार की प्राथमिकताओं में शिक्षा उस तरह नहीं है। जोशी ने जवाब दिया नहीं है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों के बजट आवंटन को देखने पर पता चलता है कि शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा और चिकित्सा के लिए बजट घटता जा रहा है, जबकि सड़क और रोड ट्रांसपोर्ट पर खर्च बढ़ा है।
केवल सड़कें बना देने से विकास पूरा नहीं हो जाता, ‘आपने सड़क बना ली, लेकिन इंजीनियर कहां से आएगा?
उन्होंने कहा कि सड़कें कितनी बनें, कैसी बनें, देश की कैसी आवश्यकता है? इस पर विचार हो सकता है और होना भी चाहिए, लेकिन किस कीमत पर बनें, किसकी प्राथमिकता हो, इसमें भी विचार होना चाहिए। जोशी ने कहा कि किसी भी विकास नीति में सबसे पहले यह तय होना चाहिए कि देश की प्राथमिकता क्या है? उन्होंने कहा कि अगर प्राथमिकता देश में औद्योगीकरण की है और वह भी निजी औद्योगीकरण की है, तो हर चीज उसी तरफ से चलेगी। अगर आपकी प्राथमिकता देश के समग्र विकास की है, तो फिर शिक्षा उस तरफ चलेगी।
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उन्होंने बुनियादी ढांचे और शिक्षा के बीच संबंध का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल सड़कें बना देने से विकास पूरा नहीं हो जाता। ‘आपने सड़क बना ली, लेकिन इंजीनियर कहां से आएगा? उसके लिए तो इंजीनियरिंग कॉलेज बनाने पड़ेंगे। अगर आपने सड़क बना ली, तो सड़क बनाने की मशीन कहां से आएगी? अगर वह विदेश से आ रही है, तो फिर फायदा क्या हुआ?
सिर्फ इसलिए पुरानी शिक्षा नीति को बदलना उचित नहीं था कि उसे राजीव गांधी के कार्यकाल में बनाया गया था
मुरली मनोहर जोशी ने नई शिक्षा नीति को लेकर कहा कि इसकी पहली कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के समय की गई थी। उन्होंने बताया कि उस समय पाठ्यपुस्तकों में विभिन्न समुदायों और जातियों को लेकर आपत्तिजनक सामग्री का मामला सामने आया था और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। इसके बाद उनसे नई शिक्षा नीति बनाने को कहा गया। जोशी ने बताया उन्होंने उस समय की शिक्षा नीति का अध्ययन किया और पाया कि नई नीति बनाने की जरूरत नहीं थी।
उन्होंने कहा कि मैंने पुरानी शिक्षा नीति देखी। मैंने कहा कोई जरूरत नहीं है। हम जो कुछ करना चाहते हैं, इससे हो सकता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सिर्फ इसलिए पुरानी शिक्षा नीति को बदलना उचित नहीं था कि उसे राजीव गांधी के कार्यकाल में बनाया गया था। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने पुरानी शिक्षा नीति के आधार पर ही जरूरी बदलाव किए और जहां विभिन्न पहलुओं को आपस में जोड़ना जरूरी था, वहां ऐसा किया गया।
शिक्षा नीति बनाते समय सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका उद्देश्य क्या है?
जोशी ने कहा कि शिक्षा नीति बनाते समय सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका उद्देश्य क्या है? वह उद्देश्य यह नहीं हो सकता कि वह किसी एक औद्योगिक नीति से जुड़ा हो, या किसी एक व्यापारिक नीति से जुड़ा हो, या किसी अंतरराष्ट्रीय नीति से जुड़ा हो या किसी युद्ध की नीति से जुड़ा हो। समग्र होना चाहिए, जिसमें ये सब होना चाहिए और मनुष्य का विकास भी। जोशी ने नई शिक्षा नीति तैयार करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पुरानी नीति की अध्यक्ष रहे वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन उनके पुराने मित्र हैं। जोशी के मुताबिक, जब उन्होंने कस्तूरीरंगन से पूछा कि वह नई शिक्षा नीति में क्या कर रहे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि ‘कमेटी जो कर रही है, कर रही है। मैं तो जो आता है, उसको समन्वित कर देता हूं।
जोशी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में कई बातें नीति आयोग से भी आई थीं। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान मौजूद योजना आयोग से इसकी तुलना करते हुए कहा,कि हमारे समय में योजना आयोग था, लेकिन योजना आयोग शिक्षा में दखल नहीं देता था। इतना कह देता था कि इस तरह के लोग चाहिए, लेबर फोर्स ऐसी होनी चाहिए।
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बच्चा गरीब हो या अमीर हो, मोहल्ले में पढ़ेगा, गांव में पढ़ेगा
जोशी ने शिक्षा में समानता के लिए एक समान स्कूली व्यवस्था की वकालत की। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर संविधान में संशोधन करके यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि हर बच्चा अपने पड़ोस के स्कूल में ही पढ़े। उन्होंने कहा कि बच्चा चाहे धनाढ्य व्यक्ति का हो, चाहे आईएएस अफसर का हो, किसी का भी बच्चा हो, गरीब हो या अमीर हो, मोहल्ले में पढ़ेगा, गांव में पढ़ेगा। समान शिक्षा प्रारंभ से ही होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि कम से कम माध्यमिक शिक्षा तक यह व्यवस्था लागू होनी चाहिए। जोशी ने कहा कि यह मेरी कल्पना थी और आज भी मैं इस सिद्धांत को मानता हूं कि जब तक देश में ऐसी शिक्षा नहीं होगी और शिक्षा जब तक नि:शुल्क नहीं होगी इस स्तर तक, इस देश में हम शिक्षा के मामले में बहुत पीछे रहेंगे।
लोगों की शिक्षा और स्वास्थ्य से पैसा बनाएं, यह इस देश में कभी नहीं हुआ
शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण पर भी जोशी ने सवाल उठाते हुए कहा कि शिक्षा को व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए और इसका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग शिक्षा के क्षेत्र में आते हैं, वे शिक्षा के क्षेत्र में जरूर आएं। देश के लिए आवश्यक है, उससे पैसा भी बना सकते हैं, लेकिन उसके ऊपर कुछ ऐसे प्रतिबंध भी होने चाहिए कि शिक्षा से पैदा हुआ धन शिक्षा में जाएगा।जोशी ने शिक्षा और स्वास्थ्य को मुनाफा कमाने का माध्यम बनाए जाने का विरोध करते हुए कहा कि यह नहीं किया जा सकता कि आप चिकित्सा और शिक्षा से, लोगों की शिक्षा और स्वास्थ्य यानी बीमारी से पैसा बनाएं। यह इस देश में कभी नहीं हुआ।
‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को लेकर भी जोशी ने सवाल उठाए
मौजूदा शिक्षा नीति में ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को लेकर भी जोशी ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लक्ष्य तय करना अच्छी बात है, लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि ‘विकास’ और ‘विकसित’ होने का अर्थ क्या है? उन्होंने सवाल किया कि आधुनिक विकास के पैमाने पर आदिवासी समुदायों को भले ही ‘अविकसित’ माना जाए, लेकिन मानवीय दृष्टि से ऐसा कैसे कहा जा सकता है?
आदिवासी समुदाय भले ही ‘अविकसित’ माना जाए, झूठ नहीं बोलता, चोरी नहीं करता, जीवन प्रकृति के साथ है, सुखी है, जंगल नहीं काटता
जोशी ने कहा कि वह पर्यावरण की रक्षा कर रहा है, सीधा-सादा है, झूठ नहीं बोलता, चोरी नहीं करता, जीवन प्रकृति के साथ है, सुखी है, जंगल नहीं काटता। उनके मुताबिक, शिक्षा नीति में यह तय करना जरूरी है कि समाज के लिए जीवन-मूल्य क्या होंगे? उन्होंने कहा कि आप जीवन-मूल्य तो वो रखना चाहते हैं और आर्थिक मूल्य ये पैदा करना चाहते हैं। यह अंतर्विरोध है। जोशी ने शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और महंगी होती उच्च शिक्षा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार ‘महान वैदिक परंपरा’ और ‘ज्ञान परंपरा’ की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे शिक्षा संस्थान बनाए जा रहे हैं जहां पढ़ाई का खर्च आम व्यक्ति की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
उन्होंने कहा, कि अच्छा पढ़ना है तो वहां जाओ, उसके लिए पचास लाख रुपये लाओ। क्या मतलब है इस बात का? कोई गरीब आदमी नहीं पढ़ सकता इसमें। उन्होंने कहा कि महंगी शिक्षा आर्थिक और सामाजिक विषमता को और बढ़ाती है। जोशी ने कहा कि इसका असर बड़े शिक्षण संस्थानों में छात्रों के बीच पैदा होने वाले सामाजिक दबाव में भी दिखाई देता है। उन्होंने सवाल किया कि ‘बड़े संस्थानों में ही छात्रों की आत्महत्याएं क्यों हो रही हैं? छोटे विद्यालयों में नहीं हो रही हैं। उनके मुताबिक, आर्थिक और सामाजिक विषमता मिलकर स्थिति को और गंभीर बना देती है।
सरकारी स्कूलों में बच्चे क्यों कम हो रहे हैं यह नहीं पूछा जा रहा है?
सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने के तर्क पर भी जोशी ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने को इसके पीछे की वजह बताया जा रहा है, लेकिन यह नहीं पूछा जा रहा कि बच्चे कम क्यों हुए? उन्होंने कहा कि बच्चे इसलिए कम हैं कि वह कहता है अध्यापक नहीं आता। अध्यापक क्यों आए? आपने कोई व्यवस्था तो की नहीं हुई। जोशी के मुताबिक, सरकारी स्कूलों को बंद करने के बजाय सरकार को उनकी बुनियादी व्यवस्था सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह जो हल्ला मचाया जाता है कि यह होगा, कुछ नहीं होगा। करिए तो सही। कोई परेशानी नहीं है। हम आज करके दिखा देंगे।
शिक्षा संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की कमी का मुद्दा भी जोशी ने उठाया
उन्होंने कहा कि जब आपने शिक्षा (स्कूल) तो खोल दी और अध्यापक है नहीं, तो छात्र क्या करेगा? अभी आपने एक बच्ची का प्रदर्शन देखा। वह कह रही है कि हमारे यहां फिजिक्स का तो टीचर ही नहीं है। दूसरी वाली कह रही है कि हमारी तो बिल्डिंग ही नहीं है और चौथा कह रहा है कि मेरे विद्यालय में छत ही नहीं है। ये बच्चे कह रहे हैं। तो आप किधर जा रहे हो?