नई दिल्ली। प्रत्येक शीतकाल भारत की सतत वायु प्रदूषण समस्या की याद दिलाता है, जो उत्तर भारत के शहरों में धुंध के रूप में व्याप्त है। आंकड़े दर्शाते हैं कि अन्य महीनों में भी वायु प्रदूषण का स्तर ऊंचा रहता है, यहां तक कि मुंबई जैसे तटीय शहरों में भी, जिसका मुख्य कारण औद्योगिक गतिविधियां और वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन है। लेकिन सर्दियों के दौरान मौसम संबंधी कारक हवा की दिशा, कम तापमान और कुछ ट्रिगर (खेतों में पराली जलाना और आग लगाने वाले पटाखे) दिल्ली जैसे शहरों में स्थिति को खराब कर देते हैं। इस संदर्भ में चीन को अक्सर अनुकरणीय उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
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इस महीने की शुरुआत में भारत में चीनी दूतावास के प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया पर कहा था कि चीन भी एक समय भयंकर धुंध से जूझ रहा था। इससे निपटने के लिए वह नीले आसमान की ओर अपनी यात्रा को भारत के साथ साझा करने के लिए तैयार हैं। चीन में वास्तव में मुद्दे क्या थे। इनके समाधान में यह कितना सफल रहा और क्या ये उपाय भारत पर लागू किये जा सकते हैं।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व वरिष्ठ शोधकर्ता और चीन के नानजिंग सूचना विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर अरीदीप मुखर्जी देशों की वायु प्रदूषण समस्याओं की तुलना करने वाले 2023 के अध्ययन के सह-लेखक थे। उन्होंने बताया कि भारत का वर्तमान वायु प्रदूषण परिदृश्य उच्च कण पदार्थ सांद्रता और इसके साथ जुड़े महत्वपूर्ण स्वास्थ्य और आर्थिक बोझ के मामले में 2000 के दशक के अंत में चीन के बराबर है। दोनों राष्ट्र प्रदूषण के सामान्य कारणों को साझा करते हैं। जैसे तीव्र विकास और शहरीकरण। 1978 में आर्थिक उदारीकरण के साथ औद्योगिक विकास की ओर चीन के रुख के कारण कार्बन उत्सर्जन में कई गुना वृद्धि हुई। 2000 के दशक तक ये उपोत्पाद धुंधले आसमान और नदी प्रदूषण में दिखाई देने लगे, जिसके कारण सत्तावादी राज्य के तहत भी सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन हुए।