Youth Politics: 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद अब खत्म होने की दिशा में है, लेकिन देश को ऐसी ‘दिमागी नक्सल’ सोच से भी सतर्क रहने की जरूरत है, जो युवाओं को भटकाने और समाज में अशांति पैदा करने का प्रयास करती है। प्रधानमंत्री ने ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने और युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया।
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पीएम के इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए CJP प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि सरकार से सवाल करना या अपने अधिकारों और मांगों के लिए आवाज उठाना किसी युवा को नक्सली नहीं बना देता। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों के जरिए सरकार असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है।
दास ने केंद्र पर युवाओं की समस्याओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए कहा कि देश में रोजगार, शिक्षा और अन्य बुनियादी मुद्दों को लेकर युवा लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका दावा है कि सत्ता पक्ष ‘आपका Gen-Z बनाम हमारा Gen-Z’ जैसा नैरेटिव खड़ा करके युवाओं के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रहा है।
CJP नेता ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठा रहे हैं। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक असहमति की आवाज बताते हुए कहा कि अब हर जिले में एक तरह का ‘जंतर-मंतर’ तैयार होता नजर आ रहा है, जहां लोग सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री के बयान और CJP के पलटवार के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है। एक तरफ सरकार ‘दिमागी नक्सल’ सोच को देश की सामाजिक और युवा शक्ति के लिए खतरा बता रही है, वहीं विपक्षी आवाजें इसे असहमति को दबाने वाला राजनीतिक शब्द बता रही हैं। आने वाले दिनों में इस बयान को लेकर सियासी बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।