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शंकराचार्य की पदवी व अधिकारियों के नोटिस पर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने रखा अपना पक्ष, बोले- लेंगे लीगल एक्शन

By संतोष सिंह 
Updated Date

Magh Mela 2026: माघ मेले में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand Saraswati of Jyotishpeeth) का धरना प्रदर्शन जारी है। मेला प्राधिकरण के तरफ से नोटिस दिए जाने के मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने लीगल एक्शन लेने की बात कही है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को तोड़ मरोड़ कर मुझे नोटिस दी गई।

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नोटिस सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की श्रेणी में आता है

इसी मामले को लेकर स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मेला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पीएन मिश्रा ने कानूनी पक्ष रखते हुए कहा कि प्रशासन के तरफ से भेजा गया नोटिस सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की श्रेणी में आता है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि बीती रात 12 बजे के बाद एक अधिकारी उनके पास आए और रात में ही नोटिस स्वीकार करने का दबाव बनाने लगे। नोटिस देने वाला व्यक्ति कानूनगो था और नोटिस चस्पा कर प्रशासन के अधिकारी चले गए।

खुद सरकार ने महाकुंभ में सरकार ने एक स्मारिका छापी थी, उसमें मुझे शंकराचार्य के रूप में छपा गया

उन्होंने सवाल उठाया कि मेला प्राधिकरण के सामने ऐसी कौन-सी आपात स्थिति आ गई, जिसके चलते आधी रात में नोटिस चस्पा किया गया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का गलत हवाला देकर ये लोग कब तक बच पाएंगे? खुद सरकार ने महाकुंभ में सरकार ने एक स्मारिका (पत्रिका) छापी थी, उसमें मुझे शंकराचार्य के रूप में छपा गया था।

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ज्योतिषपीठ में शंकराचार्य की पदवी को लेकर अविमुक्तेश्वरानंद और वासुदेवानंद के बीच है विवाद 

बता दें कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेला प्रशासन ने नोटिस जारी कर 24 घंटे में यह साबित करने को कहा है कि वे ही असली शंकराचार्य हैं? कानूनगो माघ मेला शंकराचार्य के शिविर पहुंचे और उन्होंने शंकराचार्य के शिष्यों से नोटिस लेने के लिए कहा। शिष्यों ने नोटिस लेने से मना कर दिया था। इसके बाद नोटिस सुबह गेट पर नोटिस चस्पा कर दिया। नोटिस मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से जारी किया गया है। दरअसल, ज्योतिषपीठ में शंकराचार्य की पदवी को लेकर अविमुक्तेश्वरानंद और वासुदेवानंद के बीच विवाद है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है। इसी बात को आधार बनाकर प्रयागराज माघ मेला प्रशासन ने नोटिस जारी किया है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील पीएन मिश्रा ने कहा कि नोटिस में 14 अक्तूबर 2022 के आदेश का हवाला दिया गया है। प्रशासन SC के जिस आदेश का हवाला दे रहा है, उसके पहले 21 सितंबर 2022 का आदेश है, जिसके ऑर्डर में स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बताया गया था। स्वामीजी का पट्टाभिषेक तो 12 सितंबर 2022 को ही हो चुका था। प्रशासन जिसे सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर बता रहा है, वह 17 अक्टूबर का है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक इससे पहले ही हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में ही कई जगह शंकराचार्य लिखा है। प्रशासन के अधिकारियों ने जो नोटिस भेजा है, वह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का बनता है।

14 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने जो ऑर्डर दिया था उसमें सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर के बाद किसी पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी। वकील पीएन मिश्रा के अनुसार, प्रशासन जिस 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला दे रहा है, उसके बाद 17 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के किसी भी पट्टाभिषेक पर रोक लगाने की बात कही थी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक इससे पहले ही हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी कई स्थानों पर उन्हें शंकराचार्य के रूप में संबोधित किया गया है।

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…इसलिए लिख रहे हैं शंकराचार्य

जगदगुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अधिवक्ता पीएन मिश्र ने मंगलवार को माघ मेला स्थित स्वामी के शिविर के सामने धरना स्थल पर मीडिया से मुखातिब हुए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पट्टाभिषेक पर रोक लगाई है। ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य लिखने पर रोक नहीं है। बताया कि अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं। उनके गुरु ने उनके नाम रजिटर्ड वसीयत की है। इसी के आधार पर वह शंकराचार्य लिख रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने मुझे शंकराचार्य लिखने से नहीं रोका

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मुझे शंकराचार्य लिखने से नहीं रोका है, जिन लोगों ने हमें नोटिस दिया है उन्हें जरूर जवाब दिया जा रहा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को गलत तरीके से पेश कर नोटिस जारी करने के मामले में एक्शन भी लिया जाएगा। इतना ही नहीं मौनी अमावस्या के दिन बाल बटुकों के साथ मारपीट के मामले में भी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।

अखिलेश यादव ने फोन पर बात की

वहीं, इस पूरे मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से फोन पर बातचीत की है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि अखिलेश यादव का फोन आया था राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के लोग भी हमारे पास आए थे। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि हमने किसी को नहीं बुलाया है। कोई स्वेच्छा से आया है तो स्वागत है, लेकिन हम किसी पार्टी को मदद के लिए आवाहृन नहीं कर रहे हैं।

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मैं पक्ष में हूं न विपक्ष में : स्वामी निश्चलानंद सरस्वती

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शंकराचार्य के रूप में पुरी पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का मौन समर्थन मिलने का दावा किया था। स्वामी निश्चलानंद ने उस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि मैं इस मामले में कुछ बोलना नहीं चाहता। मैं किसी के पक्ष में हूं न विपक्ष में। अविमुक्तेश्वरानंद मेरा लाडला है, लेकिन विवाद में मुझे नहीं बोलना। उन्होंने मेला प्रशासन के निर्णय को अकाट्य बताया। साथ ही कहा कि मीडिया और दूसरे लोग विवाद को तूल दे रहे हैं, जो उचित नहीं है।

भाजपा सरकार को संतों के इस अपमान के लिए तत्काल क्षमा मांगनी चाहिए : अशोक गहलोत

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अशोक गहलोत ने की निंदा उधर, इस मामले मे राजनीतिक रंग भी ले लिया है। राजस्थान के पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने एक्स पर एक पोस्ट लिखकर इस घटना की निंदा की है। उन्होंने पोस्ट में लिखा, ‘प्रयागराज जैसी पावन धरा पर, माघ मेले के दौरान पूज्य शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के साथ पुलिसिया दुर्व्यवहार और उनका अन्न-जल त्यागकर धरने पर बैठना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है.’ उन्होंने आगे लिखा, ‘धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा सरकार के राज में अगर सर्वोच्च संतों का यह हाल है, तो यह घोर पाप है। सत्ता के अहंकार में प्रशासन द्वारा माफी मांगने के बजाय संत को ही नोटिस थमाना ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ का प्रमाण है। शास्त्रों में कहा गया है: ‘न हि प्रभवष्णुः कश्चिदपि, अवमन्य तपस्विनः क्षेमं गन्तुम्’ अर्थात्: साधु का अपमान करके कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति/शासक कल्याण को प्राप्त नहीं हो सकता। भाजपा सरकार को संतों के इस अपमान के लिए तत्काल क्षमा मांगनी चाहिए।

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