नई दिल्ली। सोचिए, अगर आप आज कोई जमीन खरीदें और उसका मालिकाना हक आपके पोते या परपोते को मिले, तो कैसा लगेगा? उत्तराखंड के हरिद्वार से सामने आया एक मामला कुछ ऐसा ही है, जहां एक परिवार को अपनी खरीदी हुई जमीन का अधिकार पाने के लिए पूरे 70 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
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मामला हरिद्वार के नसीरपुर कला गांव का है। यहां शराफत अली के पूर्वजों ने वर्ष 1957 में करीब साढ़े 15 बीघा जमीन खरीदी थी। लेकिन खरीद के कुछ समय बाद ही जमीन चकबंदी और राजस्व रिकॉर्ड के विवाद में फंस गई। धीरे-धीरे मामला इतना उलझ गया कि कई लोग इस जमीन पर दावा करने लगे और परिवार को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
चार पीढ़ियों ने लड़ी एक ही लड़ाई
यह विवाद इतना लंबा चला कि मुकदमा शुरू करने वाली दो पीढ़ियां दुनिया से विदा हो गईं। इसके बाद तीसरी और चौथी पीढ़ी ने इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाया। परिवार ने निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक कई जगह न्याय की गुहार लगाई, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। करीब सात दशक की लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने परिवार के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें उनकी जमीन का अधिकार वापस दिलाया।
रिकॉर्ड में ही नहीं था परिवार का नाम
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परिवार के मुताबिक, चकबंदी प्रक्रिया के दौरान उन्हें पता चला कि जमीन के सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज ही नहीं था और जमीन अब भी विक्रेता के नाम पर दिखाई जा रही थी। कई बार समझौते की कोशिशें भी हुईं, लेकिन विवाद का समाधान नहीं निकल सका।
फैसले से गांव में भी खुशी
करीब 70 साल बाद आए इस फैसले से परिवार में खुशी का माहौल है। गांव के लोगों का कहना है कि जमीन विवाद के कारण कई विकास कार्य प्रभावित हो रहे थे। यहां तक कि स्कूल जाने वाले बच्चों का रास्ता भी इस विवाद की वजह से बंद हो गया था और उन्हें दूसरे रास्तों से होकर जाना पड़ता था। यह मामला सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि न्याय के लिए चार पीढ़ियों तक चले संघर्ष और धैर्य की मिसाल बन गया है।