लखनऊ। यूपी के अस्पतालों और खुदरा बाजार में अब दवाओं के खरीद मूल्य और मरीजों को बेचे जाने वाले बिक्री मूल्य के बीच भारी अंतर की शिकायतें सामने आने के बाद यूपी खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन ने सख्त कदम उठाया है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की आयुक्त डॉ. रोशन जैकब की ओर से जारी नए आदेश के मुताबिक अब राज्य की सभी खुदरा दवा दुकानों और अस्पताल परिसरों में चल रही फार्मेसियों को अपनी ऑफिशियल वेबसाइट पर दवाओं का पूरा मूल्य विवरण सार्वजनिक करना होगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता लाना और मरीजों को ओवरचार्जिंग से बचाना है।
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उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) आयुक्त IAS डॉ. रोशन जैकब ने महंगी दवाओं के खेल को रोकने और दवाओं के मनमाने दामों को काबू करने के लिए नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को एक महत्वपूर्ण पत्र भेजा है। रोशन जैकब ने मांग की है कि दवाओं की खरीद लागत (Procurement Price) से अत्यधिक अधिक कीमतों पर लगाम लगाने के लिए देशभर में ट्रेड मार्जिन कैपिंग (Trade Margin Capping) लागू की जाए।
UP में मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों की 214 फार्मेसियों की जांच के बाद पाया गया कि कई गंभीर बीमारियों (जैसे संक्रमण, कैंसर) के महंगे इंजेक्शन्स की एमआरपी (MRP) उनके खरीद मूल्य से 5 से 67 गुना तक अधिक वसूली जा रही है। उदाहरण के लिए, ₹74 का एक इंजेक्शन करीब ₹4,980 (MRP) में बेचा जा रहा था। FSDA आयुक्त ने औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO)-2013 के नियमों का हवाला देते हुए दवाओं के दामों में पूर्ण पारदर्शिता लाने का आग्रह किया है ताकि मरीजों का शोषण बंद हो सके।
वेबसाइट पर देनी होगी दवाओं की खरीद व बिक्री दर की जानकारी
खासकर अस्पताल परिसरों में संचालित ऐसी फार्मेसियां, जहां मरीजों और उनके परिजनों के पास दवा, मेडिकल इक्विपमेंट या न्यूट्रिशन प्रोडक्ट खरीदने का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता, उनके लिए नियम बेहद सख्त किए गए हैं। औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश -2013 के प्रस्तर 25 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया है कि दवा विक्रेताओं को मैन्युफैक्चरर या इंपोर्टर से प्राप्त प्राइस लिस्ट सार्वजनिक करना अनिवार्य है। लिहाजा, फार्मेसियों को अपनी वेबसाइट पर दवा निर्माता का नाम, ब्रांड नेम, जेनेरिक नाम, अस्पताल के लिए खरीद दर और मरीज के लिए बिक्री दर स्पष्ट रूप से दर्ज करनी होगी।
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इस मामले पर गरमाने लगी थी राजनीति
यह फैसला ऐसे वक्त में सामने आया है, जब राज्य दवा के नाम पर डकैती का खुलासा होने के बाद सूबे की राजनीति गरमाने लगी थी। इस पूरे मामले को समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने जोर शोर से उठाया था। उन्होंने इसे सरकार ने नाकामी बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की थी।
नकल और मिलावट पर लगेगी लगाम
एफएसडीए का मानना है कि खरीद मूल्य और एमआरपी में अत्यधिक अंतर होने पर दवा के घटिया, नकली या मिलावटी होने का संदेह रहता है, जिस पर इस व्यवस्था से अंकुश लगेगा।
लाइसेंस, फार्मासिस्ट का विवरण स्टॉक अपडेट भी जरूरी
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पारदर्शिता को शत-प्रतिशत सुनिश्चित करने के लिए वेबसाइट के होमपेज और फार्मेसी परिसर के लिए जो दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, उनमें फार्मेसी या अस्पताल की ओर से नियुक्त फार्मासिस्ट का नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर और फोटो वेबसाइट के मुख्य पृष्ठ पर लगाना जरूरी होगा। फार्मेसी का पूरा नाम, लाइसेंस संख्या, लाइसेंस होल्डर का नाम और रजिस्टर्ड परिसर का पता सार्वजनिक रहेगा। इसके अलावा, हर फार्मेसी को अपने पास उपलब्ध दवाओं के स्टॉक की जानकारी हर सप्ताह अपनी वेबसाइट पर अपडेट करनी होगी।
काउंटर पर लगेगा QR कोड और ऐप लिंक
मरीजों की सुविधा और आसान पहुंच के लिए एफएसडीए ने तकनीक के उपयोग के कड़े निर्देश दिए हैं। इसके तहत दवा दुकानों और अस्पताल फार्मेसी काउंटरों पर क्यूआर कोड या मोबाइल ऐप का लिंक प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा। मरीज या उनके रिश्तेदार अपने मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन करके सीधे फार्मेसी की वेबसाइट पर पहुंच सकेंगे और खरीदी जा रही दवा का असल खरीद व बिक्री रेट मौके पर ही चेक कर सकेंगे। यूपी में 1 नवंबर से ये व्यवस्था लागू करने की तैयारी है।