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51 शक्तिपीठों में से एक है नैमिषारण्य धाम: जहां गिरा था मां सती का हृदय, जानें क्यों माना जाता है इसे पृथ्वी का केंद्र?

By शिव मौर्या 
Updated Date

Naimisharanya Dham: सनातन धर्म में 51 शक्तिपीठों का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इन्हीं पावन शक्तिपीठों में से एक उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित नैमिषारण्य धाम (नीमसार) है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र धरा पर जगज्जननी माता सती का हृदय गिरा था। यहां मां (लिंगधारिणी) को ‘माँ ललिता देवी’ के रूप में पूजा जाता है। यह केवल एक शक्तिपीठ ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध एक ऐसा दिव्य धाम है, जिसकी महिमा तीनों लोकों में गाई जाती है।

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जहां आज तक नहीं हुई कलयुग की एंट्री
नैमिषारण्य धाम की सबसे बड़ी पहचान यहां स्थित चक्र तीर्थ है। स्कन्द पुराण और पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ऋषियों ने कलयुग के प्रभाव से बचने और तपस्या के लिए एक पवित्र स्थान की मांग की, भगवान विष्णु ने अपना दिव्य सुदर्शन चक्र छोड़ा गया। ब्रह्मा जी ने कहा था कि यह चक्र जहां जाकर गिरेगा,वही भूमि कलयुग के प्रभाव से मुक्त होगी। वह दिव्य चक्र इसी स्थान पर आकर गिरा और पाताल लोक में धंस गया, जिससे यहाँ जल की एक तीव्र धारा फूट पड़ी। इसी कारण इस कुंड को ‘चक्र तीर्थ’ कहा जाता है। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

यह स्थान कलयुग के दुष्प्रभावों से पूरी तरह अछूता और अत्यंत पवित्र माना जाता है। धरती का केंद्र और 88 हजार ऋषियों की तपोभूमि वैदिक और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, नैमिषारण्य को धरती का आध्यात्मिक केंद्र भी माना जाता है। यह वही पावन भूमि है जहाँ 88 हज़ार ऋषि-मुनियों ने एक साथ कठोर तपस्या की थी। यहाँ महर्षि वेदव्यास जी ने चार वेदों, 18 पुराणों और महाभारत की रचना की थी। इसी कारण विश्व भर में इस स्थान को ज्ञान, तप और भक्ति की सबसे बड़ी स्थली माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव के अपमान से दुखी होकर माता सती ने देह त्याग दी, तो भगवान शिव अत्यंत क्रोधित होकर उनके पार्थिव शरीर के साथ तांडव करने लगे। ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 भाग किए। जहाँ-जहाँ माता के अंग गिरे, वे स्थान ‘शक्तिपीठ’ बने। नैमिषारण्य की इस धरा पर माता सती का हृदय गिरा था। मान्यता है कि यहाँ माँ के दर्शन करने से हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है और मन को असीम शांति मिलती है।

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दुनिया भर से आते हैं लाखों श्रद्धालु
नैमिषारण्य की प्रसिद्धि केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारत के श्रद्धालुओं की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है। वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देसमों में नैमिषारण्य को अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है। यही वजह है कि यहाँ साल भर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए आते हैं। देश-विदेश से आते हैं श्रद्धालु यहां के धार्मिक व प्राचीन मन्दिरों के दर्शन के लिए। नैमिषारण्य के अन्य प्रमुख और दर्शनीय मंदिर। माँ ललिता देवी मंदिर और चक्र तीर्थ के अलावा यहाँ कई अन्य प्राचीन और सिद्ध मंदिर स्थित हैं। व्यासी गद्दी: जहाँ महर्षि वेदव्यास ने पुराणों और वेदों का संकलन किया था।

हनुमान गढ़ी: यहाँ भगवान हनुमान की दक्षिणमुखी बाल रूप की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा है। सूत गद्दी, देवपुरी और ललिता देवी मंदिर। यहां एक दक्षिण भारतीय मन्दिर बहुत प्रसिद्धि है। जिसका नाम ​श्री त्रिशक्ति धाम (बालाजी मंदिर), इसे आंध्र प्रदेश के एक ट्रस्ट द्वारा बनवाया गया है, जो पूरी तरह दक्षिण भारतीय शैली का है और यहाँ भगवान विष्णु व अन्य देवी-देवताओं के विग्रह हैं।

रिपोर्ट-दीपांजलि मिश्रा

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