लखनऊ। नवरात्रि के पावन अवसर पर मीट की दुकानें बंद रहें जो मंदिर के 500 मीटर के दायरे में हों। पर शराब की दुकान कहीं भी हो, मैकडोनॅल्ड और केएफसी और विदेशी ब्रांड कहीं भी हों। कोई पाबंदी नहीं है क्यों? क्या केवल हम शराब व विदेशी संस्थाओं को मांस बेंचने की पूरी परमिशन देंगे पर अपने लोगों के लिए जो इस देश में पैदा हुए है यहीं के हैं। इन पर कानूनी प्रतिबंध लगाना उचित है। क्या ये राजनीति फैसला है। या इसकी जरूरत भाईचारे को खत्म करने की है। जो कि हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता के हिसाब से ठीक है।
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हम लोग एक-दूसरे के यहां सेवईं और गुझिया खाने के लिए जाते हैं। एक-दूसरे का हर जगह साथ देते हैं। आजादी के बाद पहली बार ये देखने को मिल रहा है। हर जमीन के नीचे क्या, हर मस्जिद की नीचे क्या है? अगर हम इस तरीके से खोदेंगे तो किसी न किसी दूसरी परंपरा की सबसे ज्यादा बौद्ध की वस्तुएं मिलेंगी। हम लोग पूरी दुनिया में दो से तीन प्रतिशत की अर्थव्यवस्था है। हमारे देश में पिछले 10 सालों में 80 प्रतिशत ज्यादा कर्जदार हो गए, जो कि कर्जा देने की भी स्थिति में नहीं हैं। इसका जिम्मेदार कौन? कोविड के बाद सबसे पहले आवश्यक वस्तुओं, दवाई के साथ ही शराब की बिक्री का फैसला सरकार ने लिया था। क्रमश: