Advertisement
  1. हिन्दी समाचार
  2. उत्तर प्रदेश
  3. भारत-नेपाल सीमा पर श्रद्धा का धाम:बनैलिया माता मंदिर

भारत-नेपाल सीमा पर श्रद्धा का धाम:बनैलिया माता मंदिर

By विजय चौरसिया 
Updated Date

पर्दाफाश न्यूज़ ब्यूरो महराजगंज :: भारत-नेपाल सीमा से सटे नौतनवां कस्बे में स्थित बनैलिया माता मंदिर न सिर्फ भारत बल्कि नेपाल के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। खासकर नवरात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है। विदेश से नेपाल घूमने आने वाले पर्यटक भी यहां दर्शन के लिए रुकते हैं। मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर भक्त मंदिर में हाथी चढ़ाते हैं।

पढ़ें :- राहुल गांधी ने सदन में आंकड़ों से खोली मोदी सरकार की पोल, गरीब किसानों को कुचलने के लिए भारत ने खोले दरवाजे

जंगल से मंदिर तक की कहानी

मंदिर प्रबंधक ऋषि राम थापा बताते हैं कि जहां आज यह भव्य मंदिर है, वहां कभी घना जंगल और थारू समाज की जमीन हुआ करती थी। उस क्षेत्र में खेती करने वाले किसान केदारनाथ मिश्र को एक दिन दोपहर में देवी ने स्वप्न देकर आदेश दिया कि “जहां खेती करते हो, वहीं मैं निवास करती हूं। उस स्थान पर मंदिर बनवाओ, मैं सबका कल्याण करूंगी।”

उसके बाद गांव वालों के सहयोग से वर्ष 1888 में वहां एक छोटा सा मंदिर बनाया गया। घना जंगल होने के कारण इसे शुरू में वनदेवी दुर्गा मंदिर कहा गया, जो बाद में बनैलिया माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पुजारियों की परंपरा

पढ़ें :- सात करोड़ के हाइड्रोपोनिक वीड की बड़ी खेप बरामद, दो आरोपी गिरफ्तार

मंदिर की सेवा-पूजा का दायित्व समय-समय पर अलग-अलग पुजारियों ने संभाला।

रामप्यारे दास (1938–1946)

रामप्रीत दास (1946–1959)

कमलनाथ (1959–1973)

महातम यादव (1973–1996)

पढ़ें :- वर्तमान बजट अख़बारों की सुर्ख़ी बटोरने वाला ज्यादा और 'अच्छे दिन’ की उम्मीदों पर पानी फिरने वाला है : मायावती

काशी दास (1996–2005) – इनके समय में पुराने मंदिर की जगह नए मंदिर और प्रतिमा का निर्माण हुआ।

स्थापना दिवस व वार्षिक उत्सव

20 जनवरी 1951 को नई प्रतिमा की स्थापना की गई। तभी से हर वर्ष इसी तिथि को मंदिर का स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिर परिसर से भव्य शोभायात्रा निकलती है और समाज के हर वर्ग के लोग उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

पांडवों से जुड़ी मान्यता

मंदिर से जुड़ी एक खास मान्यता यह भी है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव जब नेपाल के विराट नगर की ओर गए थे, तो उन्होंने यहां रात्रि विश्राम किया था। पुजारी आचार्य एम. लाल बताते हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस मंदिर का विशेष महत्व है।

पढ़ें :- 15 दिन में नहीं मिला चयन वेतनमान, तो धरना–प्रदर्शन को विवश होगा जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संगठन
Advertisement