UP Election 2027: लखीमपुर सदर सीट का सियासी इतिहास समाजवादी पार्टी के लिए काफी अहम रहा है। इस सीट पर डॉ. कौशल किशोर का लंबे समय तक दबदबा रहा। वह सपा के टिकट पर 1996, 2002 और 2007 में लगातार तीन बार विधायक चुने गए। जून 2010 में उनके निधन के बाद सीट खाली हुई और उसी साल हुए उपचुनाव में सपा ने उनके पोते उत्कर्ष वर्मा को मैदान में उतारा।
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उत्कर्ष ने जीत दर्ज की और उस वक्त वह प्रदेश के सबसे कम उम्र के विधायकों में शामिल हुए। इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने लखीमपुर सदर से जीत हासिल की। यानी लखीमपुर सदर से उत्कर्ष वर्मा का राजनीतिक रिश्ता सिर्फ एक चुनाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस सीट से उनका पारिवारिक और राजनीतिक जुड़ाव पुराना है।
लेकिन 2017 में तस्वीर बदल गई। बीजेपी के योगेश वर्मा ने सपा के इस प्रभाव वाले क्षेत्र में सेंध लगाई और जीत दर्ज की। 2022 में भी दोनों चेहरे आमने-सामने आए और योगेश वर्मा ने 1 लाख 27 हजार 663 वोट हासिल कर करीब 20 हजार 578 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। यानी लगातार दो चुनाव जीतकर बीजेपी ने यहां अपनी स्थिति मजबूत की है।
लेकिन फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में लखीमपुर खीरी से सपा के उत्कर्ष वर्मा की जीत ने विधानसभा सीट के समीकरणों को फिर चर्चा में ला दिया। ऐसे में 2027 के लिए सपा के सामने चुनौती सिर्फ बीजेपी को हराने की नहीं, बल्कि उस सामाजिक समीकरण को दोबारा मजबूत करने की है, जिसने लंबे समय तक इस सीट पर पार्टी को ताकत दी।
बात करे यहां के जातिये समीकरण की तो ,लखीमपुर सदर की राजनीति में कुर्मी वोट को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके साथ मुस्लिम, पासी, ब्राह्मण, यादव और दूसरे सामाजिक समूहों का वोट भी चुनावी तस्वीर बदल सकता है। स्थानीय स्तर पर सामने आने वाले अनुमान में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 90 हजार, कुर्मी करीब 80 हजार, पासी करीब 35 हजार और ब्राह्मण करीब 30 हजार बताए जाते हैं। हालांकि अलग-अलग स्रोतों में जातीय आंकड़ों को लेकर अंतर हो सकता है, इसलिए इन्हें अनुमान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
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अब बीजेपी की बात करें तो विधायक योगेश वर्मा विकास कार्यों और केंद्र-प्रदेश सरकार की योजनाओं को अपनी ताकत बताते हैं। बीजेपी का फोकस सरकार की योजनाओं और अपने सामाजिक समर्थन को बनाए रखने पर है। वहीं सपा का आरोप है कि शहरी इलाकों के साथ-साथ बाढ़ प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं पर पर्याप्त काम नहीं हुआ। पार्टी बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और एक मजबूत कुर्मी चेहरे के जरिए चुनावी मुकाबला तैयार करने की बात कर रही है। और यहीं से 2027 की असली लड़ाई शुरू होती है।