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सोने-चांदी पर ड्यूटी बढ़ाने के बावजूद नहीं थमा करेंसी मार्केट का भूचाल, डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 95.75 पर पहुंचा

By santosh singh 
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Rupee vs Dollar : मोदी सरकार (Modi Government) ने सोने और चांदी पर कस्टम ड्यूटी 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया। इसके बावजूद भारतीय रुपये में गिरावट थमती नजर नहीं आ रही है। बुधवार को रुपया अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले 0.1 फीसदी कमजोर होकर 95.7450 के नए ऑल-टाइम लो पर पहुंच गया। मंगलवार को भी रुपया 40 पैसे टूटकर 95.68 के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ था, जबकि इंट्रा-डे ट्रेडिंग (Intra-day Trading) में यह 95.7375 तक फिसल गया था।

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एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल रुपया

साल 2026 में अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले 6.5 फीसदी से अधिक कमजोर हो चुका है और एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल है। सरकार ने हाल ही में सोने और चांदी पर आयात शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है। यह कदम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल और आयात लागत में वृद्धि को देखते हुए उठाया गया है, ताकि विदेशी मुद्रा बचाई जा सके और व्यापार घाटे (Trade Deficit) को नियंत्रित किया जा सके। इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार (Interbank Foreign Exchange Market) में रुपया 95.52 प्रति डॉलर पर खुला, जो पिछले बंद भाव से 16 पैसे की मजबूती दिखाता है। हालांकि, दिन के दूसरे हिस्से में रुपये पर फिर दबाव बढ़ गया और इसमें तेज गिरावट देखने को मिली।

प्रधानमंत्री की अपील और सरकार के कड़े कदम

रुपए में लगातार आ रही गिरावट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने पिछले वीकेंड देशवासियों से विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए अपील की थी। उन्होंने लोगों से फिजूलखर्ची कम करने और देशहित में आर्थिक अनुशासन बनाए रखने को कहा था। इसी कड़ी में सरकार ने मंगलवार रात कीमती धातुओं के आयात पर टैरिफ बढ़ा दिए थे ताकि डॉलर के बाहर जाने की रफ्तार को कम किया जा सके। ट्रेडर्स का मानना है कि आने वाले समय में रुपए में और गिरावट देखी जा सकती है।

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करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?

डॉलर के मुकाबले किसी करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना या कमजोरी (Currency Depreciation) कहते हैं। हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व (Foreign Currency Reserves) होता है, जिससे इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन (International Transactions) होते हैं। इसके घटने-बढ़ने का असर करेंसी पर पड़ता है। अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर पर्याप्त होंगे तो रुपया स्थिर रहेगा। डॉलर घटे तो रुपया कमजोर, बढ़े तो मजबूत होगा।

रुपए में गिरावट के प्रमुख कारण

जियोपॉलिटिकल टेंशन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ईरान के साथ संघर्ष विराम यानी सीजफायर को कमजोर बताने से खाड़ी देशों में तनाव बढ़ गया है। युद्ध या संघर्ष की आशंका से निवेशक उभरते बाजारों (जैसे भारत) से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश की ओर भाग रहे हैं।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल: ईरान संकट के कारण ग्लोबल मार्केट में सप्लाई में रुकावट आने का डर है। इसी वजह से ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80% तेल आयात करता है, जिससे तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर होता है।

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बढ़ता व्यापार घाटा: जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो भारत का आयात बिल यानी इंपोर्ट बिल भी बढ़ जाता है। इससे देश का ‘करेंट अकाउंट डेफिसिट’ (CAD) बढ़ने की आशंका होती है, जो सीधे तौर पर रुपये की वैल्यू को कम करता है।

डॉलर की मजबूती: वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में ‘अमेरिकी डॉलर’ को सबसे सुरक्षित संपत्ति यानी सेफ हेवन माना जाता है। ट्रम्प के कड़े रुख के बाद दुनिया भर के बाजारों में डॉलर की डिमांड बढ़ गई है, जिससे रुपये सहित अन्य करेंसी दबाव में हैं।

विदेशी निवेशकों की निकासी: वैश्विक जोखिम बढ़ने पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश निकालकर डॉलर में वापस ले जाते हैं। बाजार से डॉलर बाहर जाने के कारण रुपए की कीमत गिर जाती है।

डॉलर महंगा, भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा

मिडिल ईस्ट संघर्ष को दशकों का सबसे गंभीर एनर्जी संकट माना जा रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है।

तेल की कीमतें: कच्चे तेल महंगे होने से भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ा है।

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जरूरी सामान महंगा: LPG, प्लास्टिक और अन्य पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स की सप्लाई प्रभावित।

महंगाई का डर: डॉलर महंगा होने से पेट्रोल-डीजल और इम्पोर्टेड सामान महंगे होंगे, जिससे रिटेल महंगाई बढ़ सकती है।

विदेश में पढ़ाई-घूमना महंगा: विदेश जाने या पढ़ाई के लिए डॉलर खरीदने पर अब ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे।

इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे: मोबाइल, लैपटॉप और आयातित पार्ट्स महंगे हो सकते हैं, क्योंकि भुगतान डॉलर में होता है।

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