नई दिल्ली: मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद बुधवार को सियासी विवाद और तेज हो गया। चुनाव आयोग ने पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा कि आयोग के सदस्यों की ओर से लिखित टिप्पणियां, सवाल और सुझाव देना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग के मुताबिक SIR समेत उसके सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
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मामला कहां से शुरू हुआ?
विवाद की शुरुआत द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से हुई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें नए मतदाताओं को जोड़ने, वोटर लिस्ट से नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR को लेकर सवाल खड़े कर दिए। हालांकि आयोग ने बाद में कहा कि इन टिप्पणियों को औपचारिक असहमति या अंतिम फैसलों में मतभेद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी
आयोग ने कहा कि किसी फैसले के अंतिम रूप लेने से पहले सदस्य सवाल उठा सकते हैं, सुझाव दे सकते हैं और तकनीकी या कानूनी बिंदुओं पर अपनी राय रख सकते हैं। ये टिप्पणियां प्रक्रिया को बेहतर बनाने और मतदाता अधिकारों की सुरक्षा के लिए होती हैं।
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EC ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में करीब 40 नई पहल और कई चुनावी सुधार किए गए तथा SIR समेत मतदाता सूची से जुड़े सभी फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णय का नतीजा हैं। आयोग ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET की सुरक्षा और ऑडिट व्यवस्था का भी उल्लेख किया।
राहुल गांधी ने लगाए गंभीर आरोप
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने ‘वोट चोरी’ को भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध बताते हुए इसे संविधान पर हमला बताया और BJP, RSS तथा चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए।
खड़गे बोले- अब सवाल और गंभीर
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने दावा किया कि विपक्ष लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया और आयोग की भूमिका को लेकर सवाल उठाता रहा है। उन्होंने रिपोर्ट में सामने आई कथित आपत्तियों का हवाला देते हुए फॉर्म-6, सॉफ्टवेयर, वोटर लिस्ट और पारदर्शिता से जुड़े मुद्दे उठाए और प्रधानमंत्री से जवाब मांगा।
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अखिलेश ने सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने को कहा
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं, तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मामले का स्वत: संज्ञान लेने की मांग की।
सिब्बल-सिंघवी ने भी उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने दोनों चुनाव आयुक्तों की सभी आपत्तियों और कथित डिसेंट नोट सार्वजनिक करने की मांग की। वहीं कपिल सिब्बल ने SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आयोग के फैसलों और फॉर्म-6 में बदलाव की प्रक्रिया की जांच की मांग की।
केजरीवाल ने SIR रद्द करने की मांग की
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और SIR को रद्द करने की मांग की। उन्होंने आयोग के कामकाज और उसके आदेशों को लेकर गंभीर आरोप लगाए। ये आरोप विपक्षी नेताओं के राजनीतिक दावे हैं, जिनका आयोग ने अपने बयान में खंडन करते हुए अपनी प्रक्रिया को कानून के मुताबिक बताया है। इस तरह अब विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि सामने आई रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की रिकॉर्डेड आपत्तियों का दावा किया गया है, जबकि चुनाव आयोग कह रहा है कि ये सामान्य आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा थीं और SIR समेत अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से हुए।