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“अखिलेश यादव कुत्ते के गले में घंटी बांधकर भी भेज दें, तो वोट उसी को देना है-” सपा MLC लाल बिहारी यादव

By Kalpna Pandey 
Updated Date

UP Politics: यूपी की सियासत में दिया गया एक ऐसा बयान जिसने चुनावी माहौल को गरमा दिया है। ये बयान दिया गया है समाजवादी पार्टी के MLC लाल बिहारी यादव के द्वारा । दरअसल, आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी की एक शिक्षक गोष्ठी चल रही थी। मंच से लाल बिहारी यादव कार्यकर्ताओं और समर्थकों से पार्टी के प्रत्याशी के पक्ष में वोट करने की अपील कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव जिसे भी प्रत्याशी बनाकर भेजें, कार्यकर्ताओं को उसी के पक्ष में मतदान करना चाहिए। अपने संदेश को समझाने के लिए उन्होंने कुत्ते और घंटी वाला उदाहरण दे दिया।

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लाल बिहारी यादव का तर्क था कि व्यक्ति से ज्यादा पार्टी और संगठन महत्वपूर्ण है। लेकिन जैसे ही उनका ये बयान सामने आया, सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस छिड़ गई। विपक्ष ने इसे लेकर समाजवादी पार्टी पर निशाना साधना शुरू कर दिया और सवाल उठने लगे कि आखिर पार्टी के नेता अपने कार्यकर्ताओं से किस तरह की राजनीतिक अपील कर रहे हैं। बीजेपी नेता आलोक अवस्थी ने कहा कि शीघ्र ही सपा ऑफिस के बाहर तमाम कुत्ते पट्टा बांधकर खड़े होंगे, इससे बड़ा अपमान लोकतंत्र का कोई नहीं कर सकता है।

हालांकि,लाल बिहारी यादव के बयान पर पार्टी बचाव में उतर आई है. सपा नेता दीपक रंजन ने कहा कि लोकतंत्र में जनता के पास रिकॉर्ड है. किसने क्या कहा? क्या नहीं उस पर नहीं जाना है और यह उनके व्यक्तिगत बयान हो सकते हैं। लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव से पहले आया ये बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि समाजवादी पार्टी और बीजेपी दोनों ही अभी से अपने संगठन को चुनावी मोड में ला रही हैं। लाल बिहारी यादव ने इसी कार्यक्रम में 2027 के विधानसभा चुनाव को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए उससे पहले होने वाले MLC चुनाव को भी जीतने की जरूरत बताई।

यानी एक तरफ बीजेपी बूथ और डिजिटल रणनीति को धार दे रही है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी अपने कार्यकर्ताओं को संगठन और नेतृत्व के फैसले के साथ मजबूती से खड़े रहने का संदेश दे रही है।लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा उसी एक लाइन की हो रही है “अखिलेश यादव कुत्ते के गले में घंटी बांधकर भेज दें, तो भी वोट उसी को देना है…”अब ये बयान समाजवादी पार्टी के लिए कितना फायदेमंद साबित होता है और कितना नुकसानदेह ये तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन इतना जरूर है कि 2027 के चुनाव की आहट के साथ यूपी की सियासत में बयानबाजी का तापमान अभी से बढ़ने लगा है।

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