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अमेरिका के पूर्व अधिकारी ने पाकिस्तान की ‘इस्तेमाल करके फेंक देने वाली वेश्या’ से की तुलना, बोले- इस पर नहीं किया जा सकता भरोसा

By संतोष सिंह 
Updated Date

नई दिल्ली। अमेरिकी रक्षा विभाग के पूर्व अधिकारी माइकल रूबिन (Former US Department of Defense official Michael Rubin) ने ‘द संडे गार्डियन लाइव’ (The Sunday Guardian Live) में प्रकाशित एक लेख में पाकिस्तान और उसके सैन्य नेतृत्व पर तीखा हमला करते हुए दावा किया कि इस्लामाबाद को लगता है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) के साथ “खेल” रहा है, जबकि “सच इसके विपरीत हो सकता है”।

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अपने लेख में, रूबिन ने लिखा कि “वॉशिंगटन के नज़रिए से, पाकिस्तान शादी करने लायक कोई औरत नहीं है, बल्कि एक ऐसी वेश्या है जिसका इस्तेमाल करके उसे फेंक दिया जाए,” और साथ ही यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर “बस एक नए दलाल हैं।” रूबिन ने तर्क दिया कि पाकिस्तान पर “भरोसा नहीं किया जा सकता” और दावा किया कि इस देश ने ऐतिहासिक रूप से वॉशिंगटन के लिए अपनी रणनीतिक अहमियत को ज़रूरत से ज़्यादा आँका है। उन्होंने लिखा कि यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब भारत में ट्रंप के हालिया पाकिस्तान से मेल-जोल बढ़ाने और उस देश तथा उसके नेतृत्व की तारीफ़ करने वाली उनकी टिप्पणियों को लेकर गुस्सा है। रूबिन ने लिखा कि ट्रंप ने ओसामा बिन लादेन को पनाह देने और तालिबान का समर्थन करने के पाकिस्तान के इतिहास के बावजूद उसे गले लगाकर, अमेरिका-भारत साझेदारी बनाने के दशकों के प्रयासों को “पूरी तरह से तबाह कर दिया है।”

पेंटागन के पूर्व अधिकारी ने मुनीर को सम्मानित करने के लिए ट्रंप की आलोचना भी की। उन्होंने मुनीर को “आतंक का समर्थक” बताया, जिसके हाथों पर “अमेरिकी और भारतीय, दोनों का खून लगा है। ट्रंप की हालिया कूटनीतिक पहलों का ज़िक्र करते हुए, रूबिन ने लिखा कि पाकिस्तान को शायद ऐसा लगता है कि वह क्षेत्रीय मध्यस्थता में अपनी भूमिका का इस्तेमाल करके भारत के खिलाफ सैन्य और रणनीतिक फायदे हासिल कर सकता है। उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर ट्रंप की समझ पर भी निशाना साधा, और कहा कि “हज़ार साल पुराने विवाद” के बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति की पिछली टिप्पणियों से पता चलता है कि उन्हें “इतिहास की कोई जानकारी नहीं है। अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास का हवाला देते हुए, रूबिन ने तर्क दिया कि वॉशिंगटन ने इस्लामाबाद के साथ बार-बार तभी संपर्क साधा है जब रणनीतिक रूप से ऐसा करना ज़रूरी था, और अपने मकसद पूरे हो जाने के बाद वह फिर से उससे दूर हो गया।

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उन्होंने शीत युद्ध के दौर के गठबंधनों, पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रतिबंधों, और सोवियत-अफगान युद्ध तथा 9/11 के बाद अफगानिस्तान में चलाए गए अभियानों के दौरान इस्लामाबाद पर वॉशिंगटन की निर्भरता का उदाहरण देते हुए बताया कि यह रिश्ता कितना “लेन-देन वाला” रहा है। रूबिन ने आगे तर्क दिया कि अब जब अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाएं मौजूद नहीं हैं, तो वॉशिंगटन के लिए पाकिस्तान का रणनीतिक महत्व एक बार फिर कम हो गया है। रूबिन ने लिखा,कि पाकिस्तान को शायद ऐसा लगता हो कि वह ट्रंप को बेवकूफ बना रहा है, लेकिन असलियत इसके ठीक उलट हो सकती है। उन्होंने आगे कहा कि इस्लामाबाद को आखिरकार यह एहसास हो ही जाएगा कि वह ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान किए गए वादों पर भरोसा नहीं कर सकता।

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