Advertisement
  1. हिन्दी समाचार
  2. दिल्ली
  3. यूजीसी सवर्ण समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती, पैदा ही नहीं होता सामाजिक तनाव का वातावरण : मायावती

यूजीसी सवर्ण समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती, पैदा ही नहीं होता सामाजिक तनाव का वातावरण : मायावती

By संतोष सिंह 
Updated Date

UGC Regulations 2026 : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लागू किये गये “प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026” (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026) नियमों पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने फिलहाल रोक लगा दिया है। कोर्ट ने कहा कि ये नियम “अस्पष्ट और संभावित दुरुपयोग के लिए योग्‍य” प्रतीत होते हैं तथा इनके लागू होने से समाज में विभाजन और सामाजिक तनाव पैदा होने का खतरा है।

पढ़ें :- SC, ST, OBC समाज के लोगों के आंख में धूल झोंकने में BJP सरकार फिर सफल हुई...यूजीसी के नए नियम पर बोले स्वामी प्रसाद मौर्य

बसपा प्रमुख मायावती (BSP Chief Mayawati) ने खुलकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर एक पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि ऐसे वर्तमान हालात के मद्देनजर रखते हुये सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का यूजीसी (UGC) के नये नियम पर रोक लगाने का आज का फैसला उचित है। जबकि देश में, इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता यदि UGC के नये नियम को लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती और जाॅच कमेटी आदि में भी अपरकास्ट समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती। बसपा सुप्रीमो मायावती (BSP Chief Mayawati) की यह पोस्ट अब सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है।

पढ़ें :- UGC Regulations 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी से जवाब मांगा, अगले आदेश तक 2012 वाले नियम लागू

UGC पर सामाजिक प्रतिक्रिया और तनाव?

देश भर में UGC के नए नियमों के खिलाफ सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किये, आरोप लगाया कि नियम भेदभाव को और तेज करेंगे तथा सामाजिक तनाव और अविश्वास का माहौल बनाएंगे। कुछ स्थानों पर बड़े पैमाने पर विरोध और राजनीतिक बयानबाजी भी हुई। वहीं, कुछ नेता और दलों ने कहा कि नियम का उद्देश्य शिक्षा में समान अवसर देना है तथा इसे जाति-विरोधी समझना गलत है, लेकिन नियमों को लागू करने से पहले व्यापक परामर्श और सभी पक्षों का विश्वास जीतना आवश्यक था।

क्यों विवाद हुआ?

विशेषज्ञों के मतानुसार, नए नियमों की भाषा ‘अस्पष्ट’ थी और इसमें कुछ प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। सामान्य व उच्च जातियों के छात्रों के पक्षकारों का यह तर्क है कि उन्होंने नियमों को लागू होने से पहले पर्याप्त परामर्श में शामिल नहीं किया गया। इस कारण से सामाजिक रूप से तनाव और विरोध का पर्याप्त माहौल तैयार हो गया, जिसने कोर्ट के फैसले को भी प्रभावित किया। बता दे, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का यह फैसला न सिर्फ न्यायिक संतुलन का उदाहरण है, बल्कि यह दर्शाता है कि किसी भी संवेदनशील नीति को लागू करने से पहले सभी समुदायों को विश्वास दिलाना और न्यायिक दृष्टिकोण से निष्पक्ष बनाना कितना आवश्यक है।

क्या है ये पूरा मामला?

पढ़ें :- न किसी पर जुल्म-ज्यादती हो, न किसी के साथ नाइंसाफ़ी...यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बोले अखिलेश यादव

UGC ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किये, जिनका मकसद विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकना और समानता बढ़ाना बताया गया। इसके अंतर्गत हर संस्थान में इक्विटी कमेटी, ए क्वल ऑपोर्ट्युनिटी सेंटर और हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था बनानी अनिवार्य थी, जो शिकायतों का निवारण और मॉनिटरिंग का काम करें। हालांकि, इन नियमों पर सबसे बड़ा विवाद यह है कि नए प्रावधानों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा को सिर्फ SC, ST और OBC तक सीमित किया गया, जिससे सामान्य/अग्र वर्ग के छात्रों को शिकायत दर्ज करने में बचा जा रहा है। इस बात को लेकर विरोध और याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गयीं।

सुप्रीम कोर्ट का विरोधी फैसला

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की दो न्यायाधीशों वाली बेंच ने कहा कि नए नियम अस्पष्ट हैं और उनका भाषा-विन्यास दुरुपयोग की आशंका उत्पन्न करता है। अगर नियम इसी रूप में लागू किये गये तो समाज में विभाजन और तनाव बढ़ सकता है। फिलहाल पुराने UGC 2012 के नियम लागू रहेंगे, और मामला आगामी 19 मार्च 2026 को फिर सुना जायेगा। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि 75 साल बाद भी जब हम जातियों से मुक्त समाज की बात करते हैं, तो ऐसे नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को शामिल कर साफ़ और समावेशी कानूनी भाषा तैयार की जानी चाहिए।

Advertisement