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अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 96 पार, अब शतक का इंतजार : कांग्रेस

By संतोष सिंह 
Updated Date

नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले भारतीय रुपया पहली बार 96.14 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव, कच्चे तेल के बढ़ते दाम और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भारतीय करेंसी (Indian Currency) पर भारी दबाव बना दिया है। एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर हालात नहीं सुधरे, तो जल्द ही एक डॉलर 100 रुपये का आंकड़ा भी छू सकता है।

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इसी बीच कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का 2013 का एक पुराना वीडियो वायरल कर उन पर जोरदार हमला बोला। इस वीडियो में तत्कालीन गुजरात सीएम मोदी, यूपीए सरकार के दौरान रुपए की कमजोरी पर सवाल उठा रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने कहा था कि रुपया ऐसे ही नहीं गिरता, देश का PM कमजोर हो तो रुपया गिरता है।

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इन बयानों को शेयर करते हुए पूछा है कि क्या अब 2026 में 90 के पार डॉलर पहुंचने पर 2013 वाला फार्मूला लागू होता है? कांग्रेस ने एक्स पर लिखा कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 96 पार, अब शतक का इंतजार है। अब बाजार के विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर हालात नहीं सुधरे तो डॉलर की कीमत जल्द ही 100 रुपये के स्तर को भी छू सकती है।

विदेशी तनाव ने बढ़ाई भारतीय बाजार की धड़कनें

इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट का जियोपॉलिटिकल संकट है। अमेरिका, इजराइल से लेकर ईरान तक के आपसी टकराव ने ग्लोबल मार्केट को डरा दिया है। होर्मुज रूट में सप्लाई बाधित होने की आशंकाओं के चलते दुनिया भर के निवेशक खौफ में हैं। युद्ध जैसे इन हालातों में निवेशक हमेशा सुरक्षित ठिकाना ढूंढते हैं, जो फिलहाल उन्हें अमेरिकी डॉलर में नजर आ रहा है। डॉलर की इसी भारी डिमांड ने डॉलर इंडेक्स (जो दुनिया की 6 प्रमुख करेंसी के मुकाबले डॉलर की ताकत मापता है) को 99.07 के स्तर पर पहुंचा दिया है। ग्लोबल मार्केट में डॉलर जितना मजबूत होता है, एशियाई करेंसी उतनी ही कमजोर पड़ने लगती हैं।

कच्चा तेल बना अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती

भारत अपनी खपत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड इस समय 107 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर को पार कर चुका है। तेल महंगा होने का मतलब है कि भारत को इसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने होंगे। रॉयटर्स के एक ताजा सर्वे की मानें तो अप्रैल महीने में ओपेक (OPEC) देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर आ गया है।

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सऊदी अरामको के सीईओ अमीन नासिर ने साफ कर दिया है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल निर्यात रुकने से हर हफ्ते करीब 10 करोड़ बैरल तेल का नुकसान हो रहा है। ऐसे में बाजार को स्थिर होने में 2027 तक का वक्त लग सकता है। इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट भी यही कहती है कि अगर अगले महीने रास्ता खुल भी गया, तब भी लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण तेल 100 डॉलर के आसपास ही टिका रहेगा।

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