नई दिल्ली। चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की टीम ने पहली बार एक मानव शरीर में आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified) सुअर का लिवर और किडनी एक साथ ट्रांसप्लांट (Pig Liver-Kidne Transplant) करने में सफलता प्राप्त की है।
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बता दें कि डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी क्रॉनिक बीमारियां हर साल लाखों लोगों की मौत का कारण बनती हैं, पर क्या आप जानते हैं कि सालाना लाखों मौतें जरूरत के समय पर आवश्यक अंग न मिल पाने के कारण भी हो जाती हैं। पिछले दशकों में मेडिकल साइंस ने अंग प्रत्यारोपण को लेकर कई कारनामे किए हैं। इसी क्रम में चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) ने एक और ऐतिहासिक चमत्कार करते हुए पहली बार किसी इंसान के शरीर में एक साथ सुअर का लिवर और किडनी दोनों को ट्रांसप्लांट (Pig Liver-Kidne Transplant) करने में सफलता पाई है।
यह उपलब्धि केवल एक सर्जरी नहीं, बल्कि अंग प्रत्यारोपण की दुनिया में एक संभावित क्रांति मानी जा रही है। दुनियाभर में लाखों मरीज हर साल किडनी, लिवर, हार्ट और अन्य अंगों के इंतजार में रहते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक लंबे समय से जानवर के अंगों को इंसानों में सुरक्षित तरीके से प्रत्यारोपित करने की तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसमें अब बड़ी सफलता मिली है।
ऐसा पहली बार नहीं है जब इंसानों में सुअर के अंग लगाए गए हों, हालांकि ये अधिकांश प्रयास केवल एक अंग तक सीमित रहे हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि एक साथ दो अंगों को प्रत्यारोपित किया गया है।
मल्टी-ऑर्गन पिग-टू-ह्यूमन ट्रांसप्लांट
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नेचर जर्नल (Nature Journal) में छपी रिपोर्ट के अनुसार, चीन के शोधकर्ताओं और डॉक्टर्स की टीम ने दुनिया का पहला मल्टी-ऑर्गन पिग-टू-ह्यूमन ट्रांसप्लांट किया है। ये अंग 53 वर्षीय व्यक्ति को लगाए गए हैं जो पहले से ही ब्रेन-डेड था। परिवार ने इस रिसर्च के लिए पहले ही अपनी सहमति दी थी। जेनेटिक तौर पर तैयार ट्रांसप्लांट किए गए सुअर के अंगों ने लगभग पांच दिनों तक बेहतर तरीके से काम किया। डॉक्टर रियल टाइम में यह देख पाए कि ये जानवरों के अंग इंसान के शरीर में कैसे काम करते हैं? इस तरह के प्रत्यारोपण को जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है, जिसका मतलब है कि एक प्रजाति से दूसरे में पूरे अंग, टिशू या कोशिकाएं ट्रांसप्लांट करना।
ट्रांसप्लांट के बाद कैसा रहा परिणाम?
वर्षों से, शोधकर्ता यह सोच रहे थे कि क्या सुअर के अंग, इंसानों में अंगों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। जेनेटिक इंजीनियरिंग और सुअर के डीएनए को एडिट करने में मिली सफलताओं ने इस को एक संभावना में बदल दिया है। ट्रांसप्लांट के शुरुआती 24 घंटों में अंगों के अस्वीकार होने के कोई संकेत नहीं मिले। इससे भविष्य में अंगों की गंभीर कमी की समस्या के समाधान की दिशा में नई उम्मीद जगी है।
विशेषज्ञों ने कहा, एक ही समय में कई अंगों का प्रत्यारोपण तकनीकी रूप से कहीं अधिक जटिल होता है और इससे जुड़े जोखिम भी अधिक होते हैं। ऐसे में यह उपलब्धि बहु-अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में अहम कदम मानी जा रही है।
लिवर-किडनी अच्छे तरीके से कर रहे थे काम
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शोधकर्ताओं के अनुसार प्रत्यारोपण के 19 घंटे के भीतर सुअर का लिवर पित्त रिलीज करने लगे और उसके सामान्य रूप से काम करने के संकेत मिलने लगे। मरीज के शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया का स्तर, किडनी रोग के कारण पहले बढ़ा हुआ था। दोनों किडनी लगाए जाने के बाद ये सामान्य स्तर पर लौट आया। यह इस बात का संकेत था कि प्रत्यारोपित किडनी भी कार्य कर रही थीं। इससे डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंचे कि जेनेटिक रूप से संशोधित सुअर के अंग मानव शरीर में महत्वपूर्ण जैविक कार्य करने में सक्षम हो सकते हैं।
जीवित मरीजों तक पहुंचने से पहले और परीक्षण जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार मनुष्यों पर इस तकनीक का उपयोग करने से पहले ब्रेन डेड व्यक्तियों और जीवित बंदरों पर और अधिक अध्ययन की जरूरत है। यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि सुअर के अंगों के माध्यम से किसी प्रकार के वायरस या बैक्टीरिया मनुष्यों में न पहुंचें। दुनियाभर में प्रत्यारोपण योग्य मानव अंगों की कमी लंबे समय से एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। अनेक मरीज वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रहते हैं। ऐसे में नई तकनीक से कई लोगों में उम्मीदें जगी हैं।