लखनऊ। भारत अपनी सांस्कृतिक विविधताओं और अनोखी परंपराओं के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। हर त्योहार के पीछे कोई न कोई कहानी, लोक मान्यता और सामाजिक महत्व छुपा होता है। ऐसा ही कुछ हमारे सबसे पवित्र त्योहारों में से एक ‘रक्षाबंधन’ के साथ भी है। आमतौर पर पूरा देश सावन महीने की पूर्णिमा को भाई-बहन के प्रेम का यह पर्व मनाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के कुछ हिस्सों और समाजों में मुख्य रक्षाबंधन के ठीक 15 दिन बाद राखी बांधी जाती है?
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पूर्णिमा नहीं, अमावस्या को बंधती है राखी
मारवाड़ी, माहेश्वरी और खंडेलवाल समाज के कई परिवारों में सावन की पूर्णिमा को राखी नहीं बांधी जाती। ये परिवार भाद्रपद (भादों) महीने की अमावस्या को रक्षाबंधन मनाते हैं। इस अमावस्या को ‘पिठोरी अमावस्या’ या ‘बड़ी अमावस्या’ कहा जाता है। स्थानीय भाषा में इस दिन बांधी जाने वाली राखी को ‘बीड़ राखी’ कहते हैं।
क्या है इसके पीछे की वजह?
इस अनोखी परंपरा के पीछे एक पुरानी लोक मान्यता जुड़ी हुई है। माना जाता है कि सदियों पहले सावन पूर्णिमा के दिन इन समाजों के किसी पूर्वज या परिवार के साथ कोई बड़ी दुखद घटना या अनहोनी घट गई थी। उस शोक के कारण परिवारों ने सावन पूर्णिमा पर त्योहार मनाना बंद कर दिया। हालांकि, भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते और रक्षा के सूत्र को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं था। इसलिए परंपरा को जीवित रखने के लिए पूर्णिमा के ठीक 15 दिन बाद आने वाली अमावस्या का दिन चुना गया। तब से लेकर आज तक ये परिवार पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ भादों की अमावस्या पर ही ‘बीड़ राखी’ मनाते आ रहे हैं।
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विभिन्न राज्यों में अलग-अलग रूप
यह परंपरा सिर्फ राजस्थान या मारवाड़ी समाज तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में इस समय ‘पोला अमावस्या’ का त्योहार मनाया जाता है। किसान परिवार इस दिन बैलों की पूजा करने के साथ-साथ रक्षा सूत्र बांधने की रस्म भी निभाते हैं।इसके अलावा,उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में हरितालिका तीज (भाद्रपद शुक्ल तृतीया) पर रक्षाबंधन मनाने का चलन है। भारत के कई पहाड़ी क्षेत्रों में यदि सावन पूर्णिमा के दिन ‘भद्रा’ का साया हो या परिवार में कोई सूतक-पातक (अशौच) लग जाए, तो लोग परेशान होने के बजाय 15 दिन बाद आने वाली पिठोरी अमावस्या या फिर कृष्ण जन्माष्टमी के दिन आराम से राखी की रस्म पूरी करते हैं।
यह परंपरा हमें सिखाती है कि भारतीय संस्कृति कितनी व्यावहारिक और लचर (Flexible) है। परिस्थितियां या तारीखें बदल सकती हैं, लेकिन अपनों के प्रति प्रेम, सुरक्षा का भाव और त्योहार की मूल भावना कभी नहीं बदलती। तरीका भले ही अलग हो, लेकिन भाई-बहन के रिश्ते की मिठास हर जगह एक जैसी ही रहती है।
रिपोर्ट : दीपांजली मिश्रा