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शरद पूर्णिमा महारास :  कला-आध्यात्मिकता की पहचान और भक्ति की पराकाष्ठा

By अनूप कुमार 
Updated Date

Sharad Purnima Maha-ras : क्या आप जानते हैं कि साल की एक रात ऐसी होती है, जब हमारी धरती पर सीधे अमृत बरसता है? जी हाँ, हम बात कर रहे हैं शरद पूर्णिमा की! यह सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारत की कला, संगीत, नृत्य और उत्सव की संस्कृति का सबसे खूबसूरत प्रतीक है।

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भक्ति की पराकाष्ठा
शरद पूर्णिमा की रात का सीधा संबंध भारतीय कला और नृत्य से है। इसी रात को द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ ‘महारास’ रचाया था। महारास भारतीय संस्कृति में एक ऐसा नृत्य है, जो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन है? एक ऐसा नृत्य, जिसे देखने के लिए स्वर्ग से देवी-देवता भी धरती पर उतर आए थे। जी हां, हम बात कर रहे हैं महारास की। भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों की वह दिव्य लीला, जो हज़ारों सालों से भारत की कला और आध्यात्मिकता की पहचान बनी हुई है। ब्रज की धरती पर हुआ यह महारास भौतिक प्रेम नहीं, बल्कि परम आनंद और भक्ति की पराकाष्ठा था।”

अलौकिक दृश्य 
कला के दृष्टिकोण से, यह रास भारत के शास्त्रीय नृत्यों (जैसे कथक, मणिपुरी और ओडिसी) की आत्मा बन गया। कवियों ने इस पर अनगिनत गीत लिखे और चित्रकारों ने कैनवास पर इस अलौकिक दृश्य को उतारा।

‘शरद उत्सव’
पूरे भारत में इस रात संस्कृति के अलग-अलग रंग दिखते हैं। गुजरात में नवरात्रि के समापन के बाद इस रात को बड़े पैमाने पर गरबा और डांडिया खेला जाता है। वहीं, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र में इसे कोजागरी पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जहाँ सुख-समृद्धि की देवी लक्ष्मी जी की पूजा होती है। इस रात शास्त्रीय संगीत की महफिलें सजती हैं, जिन्हें ‘शरद उत्सव’ कहा जाता है।

रोशनी में रखी खीर
इस रात की सबसे मीठी परंपरा है—चाँद की रोशनी में रखी खीर! माना जाता है कि इस रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत (औषधीय गुण) बरसता है। इस खीर को खाने का न सिर्फ सांस्कृतिक महत्व है, बल्कि बदलते मौसम में सेहत के लिए भी इसे बहुत फायदेमंद माना गया है।

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