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यादव जी की लव स्टोरी के खिलाफ याचिका पर सुनवाई से कोर्ट का ‘सुप्रीम इनकार’, कहा यह फिक्शन फिल्म है

By santosh singh 
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नई दिल्ली: बॉलीवुड फिल्म यादव जी की लव स्टोरी (Yadav ji Ki love story) के खिलाफ याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court ) का इनकार कर दिया है। जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि किसी फिल्म का टाइटल मात्र इसलिए असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि उससे किसी समुदाय की छवि खराब होने की आशंका जताई जा रही है।

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अदालत ने आदेश में कहा कि हमने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का अवलोकन किया है। मुख्य शिकायत यह है कि आगामी फिल्म का नाम समाज में यादव समुदाय को गलत रोशनी में प्रस्तुत करता है, इसलिए शीर्षक बदला जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि हम यह समझने में असमर्थ हैं कि फिल्म का शीर्षक किस प्रकार समुदाय को खराब रोशनी में दर्शाता है। शीर्षक में ऐसा कोई विशेषण या शब्द नहीं है जो यादव समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता हो। आशंकाएं पूरी तरह निराधार हैं।

पीठ ने अपने पूर्व आदेश घूसखोर पंडत मामले से इस मामले को अलग बताया है। अदालत ने कहा कि “घूसखोर” शब्द का अर्थ भ्रष्ट होता है जिससे एक समुदाय के साथ नकारात्मक अर्थ जोड़ा जा रहा था, जबकि इस मामले में यादव समुदाय के साथ ऐसा कोई नकारात्मक अर्थ नहीं जुड़ा है।अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत जो युक्तिसंगत प्रतिबंध हैं, वे इस मामले में लागू नहीं होते। फिल्म का नाम किसी भी प्रकार से यादव समुदाय को नकारात्मक या खराब रूप में प्रस्तुत नहीं करता। अतः रिट याचिका खारिज की जाती है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि फिल्म अभी रिलीज़ नहीं हुई है और यदि रिलीज़ के बाद वास्तव में कुछ आहत करता है तो उन्हें पुनः अदालत आने की अनुमति दी जाए। इस पर अदालत ने कमेंट किया। कहा कि थोड़ी मोटी चमड़ी रखिए (Have a thick skin) यह फिक्शन है। एक सप्ताह में सब खत्म हो जाएगा। आजकल कोई थिएटर नहीं जा रहा, सब मोबाइल पर देख रहे हैं।

कोर्ट में वकील ने यह भी दलील दी कि फिल्म में लड़की के चरित्र को जिस तरह दिखाया गया है, वह आपत्तिजनक है और किसी महिला को इस तरह प्रचारित नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी समुदाय के बीच विवाह का विरोध नहीं कर रहे हैं।

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अदालत ने दोहराया कि यह फिक्शन है, जब वकील ने कहा कि निर्माता इसे वास्तविक कहानी पर आधारित बता रहे हैं, तब अदालत ने बेंडिट क्वीन का उल्लेख किया। 1 पीठ ने कहा कि इस मामले में भी यह तर्क दिया गया था कि फिल्म में गुर्जर समुदाय को खराब रोशनी में दिखाया गया है, लेकिन उस समय भी अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आशंका या संवेदनशीलता के आधार पर फिल्म के शीर्षक या प्रदर्शन पर रोक नहीं लगाई जा सकती, जब तक कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत निर्धारित युक्तिसंगत प्रतिबंध स्पष्ट रूप से लागू न हों।

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