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UGC Equity Regulation का देश में बढ़ा विरोध, मोदी सरकार पर भड़के सवर्ण, राजस्थान में एस-4 का किया गठन

By santosh singh 
Updated Date

UGC Equity Regulations : यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) 13 जनवरी 2026 को एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसे लेकर जनरल कैटेगरी के छात्रों में नई बहस छिड़ गई है। आलोचक और शिक्षाविद UGC की नई गाइडलाइन को जातिगत भेदभाव को बढ़ाने का जरिया मान रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि नई गाइडलाइंस का इस्तेमाल बदले की भावना से किया जा सकता है।

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लांकि, यूजीसी (UGC) के इस कदम का काफी विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया पर तमाम इन्फ्लुएंसर और यूजर यूजीसी के इस नियम का कड़ा विरोध कर रहे हैं और तमाम तरह के पोस्ट कर रहे हैं। साथ ही यूजीसी के नए रेगुलेशन को वापस लेने की मांग हो रही है। इसी बीच राजस्थान में इस यूजीसी (UGC) के इस कदम के खिलाफ एस-4 का गठन हुआ है। जिसमें ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कायस्थ संगठन एक साथ आए हैं।

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जयपुर में समस्त करणी सेना , कायस्थ महासभा , ब्राह्मण संगठनों और वैश्य संगठनों के साथ मिलकर एक समन्वय समिति का गठन किया गया है जिसका नाम होगा सवर्ण समाज समन्वय समिति , जो देश भर में काम करने वाले समस्त सवर्ण संगठनों (सामान्य श्रेणी) के बीच समन्वय बनाने के लिए कार्य करेगी ।

वहीं, इसी बीच स्वामी आनंद स्वरूप ने एक्स पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा कि जयपुर में समस्त करणी सेना , कायस्थ महासभा , ब्राह्मण संगठनों और वैश्य संगठनों के साथ मिलकर एक समन्वय समिति का गठन किया गया है जिसका नाम होगा सवर्ण समाज समन्वय समिति , जो देश भर में काम करने वाले समस्त सवर्ण संगठनों (सामान्य श्रेणी) के बीच समन्वय बनाने के लिए कार्य करेगी। जरूरत है आज की यदि सभी सवर्ण संगठन एक नहीं हुए तो पतन निश्चित होगा और यदि एक हो गए तो धनानंद का विनाश हो जाएगा।” स्वामी आनंद स्वरूप की इस पोस्ट को यूजीसी के इस कदम के खिलाफ जोड़ कर देखा जा रहा है।

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एक यूजर ने एक्स पर लिखा कि आज UGC के कारण पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC के हालिया रुख़ और नीतियों को देखकर यह सवाल मजबूती से उठता है कि क्या पहली बार आज़ाद भारत में शिक्षा को हिंदू समाज को खंड-खंड करने का औज़ार बनाया जा रहा है? और अगर ऐसा है, तो सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब उस दौर में हो रहा है जब केंद्र में BJP की सरकार है। जो स्वयं को सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा संरक्षक बताती है। जिस सरकार की USP हिंदू एकता की रही है। जो सरकार 2014 में हिंदुत्व और राम मंदिर के नाम पर चुनाव जीतकर आई।

एक यूजर ने एक्स पर लिखा कि भाजपा के सामान्य वर्ग के नेता यूजीसी के समता नियमों पर चुप क्यों हैं? अगस्त 2024 में, केंद्र सरकार ने बिना आरक्षण के, यानी पार्श्व प्रविष्टि के माध्यम से 45 संयुक्त सचिव स्तर के पदों के लिए विज्ञापन जारी किया। सरकार में दलित नेता चिराग पासवान और जीतन राम मांझी ने सैद्धांतिक रूप से इसका विरोध किया, जिसके चलते सरकार को इसे वापस लेना पड़ा। केवल 45 पद! इससे न तो व्यवस्था ध्वस्त होती, न ही आसमान गिरता। न ही कोई जन आक्रोश हुआ। फिर भी दलित नेताओं ने इसे प्राथमिकता दी और सुनिश्चित किया कि वे 45 पद भी आरक्षण के माध्यम से भरे जाएं। यूजीसी के समता नियम उस पार्श्व प्रविष्टि योजना से हज़ार गुना अधिक भेदभावपूर्ण और संरचनात्मक रूप से हानिकारक हैं। फिर भी, भाजपा के किसी भी सामान्य वर्ग के प्रमुख नेता ने इसके खिलाफ बोलने का साहस नहीं दिखाया है।

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अजित भारती ने एक्स पर पीएमओ को टैग करते हुए लिखते हैं, “@PMOIndia के मीडिया मैनेजमेंट की दाद देनी पड़ेगी। UGC की मूर्खता पर एक भी शो नहीं होने दिया? पर ध्यान रहे कि ऐसी एक-एक मैनेजमेंट, लोगों के मनोमस्तिष्क में जमा होते रहेंगे। जब इनका क्रोध फूटेगा, तब आप सोशल मीडिया मैनेजमेंट भी देख लेना।

यूजीसी के कदम से सामान्य वर्ग में नाराजगी

यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 लागू कर दिया है। इसे लेकर विवाद पैदा हो रहा है। जैसे जैसे लोगों को इसके बारे में मालूम हो रहा है, त्यों त्यों एक वर्ग में नाराजगी दिखने लगी है। इस नियम में ओबीसी को SC/ST के साथ जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों में विवाद पैदा हो गया है। वो इस गाइडलाइंस को एकतरफा बता रहे हैं, ये आशंका जता रहे हैं कि इसका दुरुपयोग किया जा सकता है।

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ये गाइडलाइंस 15 जनवरी 2026 से देशभर के सभी कॉलेज, यूनिवर्सिटियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में लागू हो गए। दरअसल इसके प्रावधान इतने कड़े हैं कि लोगों को लग रहा है कि ऐसे कानून का सही इस्तेमाल तो कम होगा लेकिन इससे बदला लेने की कार्रवाई ज्यादा होगी यानी दुरुपयोग खूब हो सकता है।

जाति आधारित भेदभाव क्या है?

इन नियमों के तहत, जाति आधारित भेदभाव का अर्थ है किसी व्यक्ति के साथ केवल उसकी जाति या जनजाति के कारण किया गया कोई भी अनुचित व्यवहार। इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित छात्रों, शिक्षकों या कर्मचारियों के साथ होने वाला भेदभाव शामिल है। इस प्रकार का भेदभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हो सकता है और उच्च शिक्षा संस्थानों में किसी भी रूप में इसकी अनुमति नहीं है।

इन नियमों का पालन किसे करना होगा?

ये नियम विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों सहित सभी उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होते हैं। प्रत्येक छात्र, शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी और प्रशासक इन विनियमों के अंतर्गत आते हैं।

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