नई दिल्ली। अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर एक बार फिर शिकंजा कसने की तैयारी शुरू कर दी है। अमेरिकी सीनेट (US Senate) में एक बिल पेश किया गया है, जिसमें भारत, चीन समेत पांच देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है। इसमें हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान भी शामिल हैं।
पढ़ें :- नेपाल का 'रॉकस्टार' क्यों विलेन बना? बालेन शाह के खिलाफ भी काठमांडू की सड़कों पर उतरे लोग
बिल के मुताबिक, इन देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाया जा सकेगा। साथ ही रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा व्यवस्था पर भी नए प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। इससे पहले बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100 फीसदी कर दिया गया।
अगर यह बिल पास हो जाता है, तो अमेरिका पहली बार किसी देश पर सिर्फ इसलिए टैरिफ लगाएगा, क्योंकि वह रूस से तेल खरीदकर उसकी कमाई बढ़ा रहा है। इस कदम का मकसद रूस के तेल कारोबार पर आर्थिक दबाव बनाना और उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर करना है।
भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4 फीसदी था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
यूरोपीय देशों को टैरिफ में राहत देगा अमेरिका
पढ़ें :- अमेरिका जल्द जारी करेगा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर वाले 250 डॉलर का नोट! बदलेगा 150 साल पुराना नियम
सीनेट में पेश बिल के तहत 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100 फीसदी टैरिफ से छूट दी गई है। इन देशों को राहत इसलिए दी गई है, क्योंकि ये रूस से 15 फीसदी से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे उस पर अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं।
डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल (Democratic Senator Richard Blumenthal) ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं है। इसका निशाना सिर्फ वे देश हैं, जो अब भी रूस के तेल कारोबार को सबसे ज्यादा आर्थिक सहारा दे रहे हैं। बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (President Vladimir Putin) तक पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है।
रूस पर सख्ती वाले बिल को दोनों दलों का समर्थन
सीनेट में पेश रूस-विरोधी टैरिफ बिल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों का समर्थन मिला है। इसे अमेरिकी राजनीति में ‘बाइपार्टिसन बिल’ कहा जाता है। यानी ऐसा प्रस्ताव जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सहमत हों। आमतौर पर अमेरिका में कई बड़े विधेयक राजनीतिक मतभेदों की वजह से अटक जाते हैं। लेकिन जब दोनों दल किसी बिल के साथ खड़े होते हैं, तो उसके कांग्रेस से पारित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। हालांकि, बिल को कानून बनने के लिए अभी सीनेट और प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) दोनों से मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने पर ही यह कानून बनेगा।
बिल को दिवंगत सांसद लिंडसे ग्राहम ने पेश किया था
पढ़ें :- अमेरिकी राजनीति में बड़ा भूचाल, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश, ईरान के मिनाब में गर्ल्स स्कूल पर हमले को बताया 'वॉर क्राइम'
इस बिल को सबसे पहले रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम (Republican Senator Lindsey Graham) और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल (Democratic Senator Richard Blumenthal) ने अप्रैल 2025 में पेश किया था। अब तक 26 सीनेटर इस बिल को अपना समर्थन दे चुके हैं और आगे समर्थन बढ़ने की उम्मीद है।
11 जुलाई को लिंडसे ग्राहम (Lindsey Graham) का निधन हो गया था। निधन से एक दिन पहले उन्होंने यूक्रेन दौरे के दौरान कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (President Donald Trump) इस बिल को आगे बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं। ट्रम्प ने भी व्हाइट हाउस (White House) में कहा, कि यह लिंडसे के सम्मान में है। यह उनका सबसे बड़ा मुद्दा था और इसके कानून बनने की अच्छी संभावना है। कैपिटल हिल में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों के सीनेटर एक साथ नजर आए। उन्होंने इस बिल को ग्राहम के लिए श्रद्धांजलि बताया।