लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को टालने और ग्राम प्रधानों का कार्यकाल छह महीने आगे बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस निर्णय पर गहरी नाराजगी जताते हुए राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस ए.के. चौधरी की अवकाशकालीन पीठ ने साफ शब्दों में पूछा है कि सरकार और आयोग मिलकर यह बताएं कि आखिर सूबे में पंचायत चुनाव किस तारीख को कराए जाएंगे।
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दरअसल, राज्य सरकार ने चुनाव होने और नए प्रधानों के चुने जाने तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त कर उनका कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया था। सरकार के इसी आदेश को स्थानीय अधिवक्ता ओम प्रकाश प्रजापति और अमरेंद्र नाथ ने याचिका दाखिल कर अदालत में चुनौती दी है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को सख्त निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई पर पंचायत चुनाव कराने की पूरी संभावित टाइमलाइन और तारीखों का खाका अदालत के सामने पेश किया जाए।
इसके साथ ही, कोर्ट ने इस पूरे मामले में ‘ओबीसी (OBC) आयोग की रिपोर्ट’ को भी रिकॉर्ड पर लाने का आदेश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई को होगी। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब शासन और निर्वाचन आयोग के गलियारों में खलबली मच गई है, क्योंकि सरकार पर जल्द से जल्द चुनावी तारीखों का एलान करने का कानूनी दबाव बेहद बढ़ गया है।