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लिव-इन पार्टनर को भी मिलेगा पत्नी का दर्जा, क्रूरता के खिलाफ कानूनी सुरक्षा, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में रहने वाले लोगों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।अदालत ने कहा कि किसी साथी के साथ होने वाली क्रूरता से सुरक्षा का अधिकार केवल कानूनी विवाह तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बदलते सामाजिक परिवेश को देखते हुए कानून की व्याख्या भी समय के साथ व्यापक होनी चाहिए।

By santosh singh 
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में रहने वाले लोगों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।अदालत ने कहा कि किसी साथी के साथ होने वाली क्रूरता से सुरक्षा का अधिकार केवल कानूनी विवाह तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बदलते सामाजिक परिवेश को देखते हुए कानून की व्याख्या भी समय के साथ व्यापक होनी चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship)  में रहने वाले व्यक्ति को भी अपने पार्टनर या उसके परिजनों की ओर से होने वाले उत्पीड़न और क्रूरता के खिलाफ कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A को केवल शादीशुदा रिश्तों तक सीमित मानने के बजाय इसके उद्देश्य और सामाजिक जरूरतों के आधार पर देखने पर जोर दिया।

धारा 498-A पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता किए जाने से जुड़े मामलों में कानूनी कार्रवाई का प्रावधान करती है। इसके तहत दोष साबित होने पर तीन साल तक की जेल और जुर्माना लगाया जा सकता है। कानून में क्रूरता के दायरे में ऐसा शारीरिक या मानसिक व्यवहार शामिल है, जिससे किसी महिला को गंभीर नुकसान पहुंचे या वह आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाए। दहेज, संपत्ति या किसी अन्य गैरकानूनी मांग को लेकर प्रताड़ित करना भी इसके अंतर्गत आ सकता है।

अदालत ने माना कि रिश्तों की प्रकृति में बदलाव के साथ कानूनी सुरक्षा का दायरा भी व्यावहारिक और संवेदनशील होना चाहिए। इस फैसले के बाद लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों को उत्पीड़न के मामलों में न्याय पाने के लिए मजबूत कानूनी आधार मिलने की उम्मीद है।

रिपोर्ट: कल्पना पांडेय

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