Durva Vinayak Chaturthi 2026 : सनातन धर्म में दूर्वा (दूब घास) को अत्यंत पवित्र माना गया है। इसी प्रका भगवान गणेश को प्रथमपूज्य माना जाता है। रिद्धि सिद्धि के दाता भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। सावन मास में उगने वाली हरी दूर्वा को प्रकृति की शीतलता, पवित्रता और जीवन शक्ति का प्रतीक माना गया है। सावन की दूर्वा गणेश चतुर्थी 16 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी।
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गणेश जी और दूर्वा की पौराणिक कथा
पुराणों में एक कथा मिलती है कि अनलासुर नामक असुर अपने तेज और क्रोध से तीनों लोकों को परेशान कर रहा था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश ने उसका संहार किया। अनलासुर को निगलने के बाद गणेश जी के शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न हो गई। देवताओं और ऋषियों ने कई उपाय किए, लेकिन गर्मी शांत नहीं हुई।
तब ऋषियों ने भगवान गणेश को 21 दूर्वा की पत्तियां अर्पित कीं। दूर्वा के स्पर्श से गणेश जी के शरीर की अग्नि शांत हुई। तभी से गणपति पूजा में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रसिद्ध हुई।
दूर्वा का आध्यात्मिक अर्थ
दूर्वा की तीन पत्तियां त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक मानी जाती हैं।
यह दीर्घायु, समृद्धि और शुभता का प्रतीक है।
गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से विघ्नों का नाश और बुद्धि-विवेक की प्राप्ति का विश्वास है।
सावन में दूर्वा का महत्व
सावन में वर्षा के कारण धरती पर हरियाली बढ़ती है। दूर्वा इस मौसम में प्राकृतिक रूप से अधिक उगती है। इसे शिव और गणेश दोनों की आराधना से जोड़कर देखा जाता है। सावन में दूर्वा चढ़ाना प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन ऊर्जा का सम्मान माना जाता है।
गणेश चतुर्थी पूजा में दूर्वा अर्पण
गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को सामान्यतः
21 दूर्वा दल
मोदक
लाल पुष्प
सिंदूर
अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा से दूर्वा अर्पित करने वाले भक्तों के जीवन में सुख, शांति और मंगल का आगमन होता है।
“ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र के साथ दूर्वा अर्पित करना गणेश उपासना में विशेष फलदायी माना गया है।
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