नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 70 साल पुराने अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम (Immoral Traffic Prevention Act) का गहन विश्लेषण करने के बाद एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि अगर कोई भी बालिग अपनी इच्छा से सेक्स वर्क (Sex Worke) करती है तो इसे अपराध के दायरे में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी महिलाओं को गिरफ्तार करने और उन्हें प्रताड़ित करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर कमर्शियल सेक्स के लिए मानव तस्करी की जाती है और किसी को धोखे से या फिर मजबूर करके सेक्स करवाया जाता है तो ऐसे केस में इमोरल ट्रैफिक ऐक्ट (ITPA) लागू होता है। अदालत ने कहा कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य न तो वेश्यावृत्ति को पूरी तरह से खत्म करना है और न ही इसे आपराधिक अपराध बनाना है, बल्कि इसका असली मकसद वेश्यावृत्ति के व्यावसायीकरण पर लगाम लगाना है।
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने साफ कह दिया है कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना गैरकानूनी नहीं है। वहीं वेश्यालय या कोठे चलाना गैरकानूनी है। बता दें कि इमोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन ऐक्ट 1956 (Immoral Traffic Prevention Act 1956) में बनाया गया था। इसके तहत कई धाराएं हैं और कोठे और वेश्यालय चलाने का अपराध बताया गया है। इस ऐक्ट की धारा 3 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति देह व्यापार के लिए अपनी जगह को किराए पर देता है या फिर उपयोग की अनुमति देता है तो उसे 1 से 3 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।
ITPA में क्या है?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा, इसकी धारा 4 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति सेक्स वर्कर (Sex Worker) की कमाई का इस्तेमाल करता है तो यह अपराध है। यह धारा सेक्स वर्कर (Sex Worker) के परिवार के लोगों पर भी लागू होती है। धारा 5 में कहा गया है कि जबरदस्ती, बहलाकर या फिर मजबूर करके किसी को देह व्यापार (Sex Worke) के लिए मजबूर करना भी अपराध है। धारा 7 में कहा गया है कि सार्वजनिक स्थान या किसी धार्मिक स्थान के 200 मीटर के दायरे में सेक्स वर्क (Sex Worke) करना अपराध है। हालांकि इस कानून में कहीं भी सहमति से सेक्स का जिक्र नहीं किया गया है।
अनुच्छेद 21 का जिक्र
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जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने बुद्धदेव कर्माकर बनाम बंगाल सरकार के मामले में भी बड़ा फैसला सुनाया था। यह मामला सेक्स वर्करों के पुनर्वास और अधिकारों को लेकर था। कोर्ट ने कहा था कि जिस तरह से संविधान के अनुच्छेद 21 में हर व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार मिला है उसी तरह सेक्स वर्कर भी भारत के नागरिक हैं और उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
लॉ कमीशन ऑफ इंडिया (Law Commission of India) की जांच में कई बार सामने आया है कि सेक्स वर्कर्स के साथ पुलिस का रवैया ठीक नहीं होता है। यह उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है। कोर्ट कई बार कह चुका है कि सहमित से सेक्स वर्क करना अपराध नहीं है। ऐसे में अगर कोई आईटीपीए की बाकी धाराओं का उल्लंघन नहीं कर रहा है तो उसे परेशान नहीं करना चाहिए। इस फैसले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने कहा कि अगर कोई अपनी मर्जी से सेक्स वर्क कर रहा है तो उसे हिरासत में रखने, सुधार गृह बेजने की जरूरत नहीं है