नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर दुव्वुरी सुब्बाराव (Former RBI Governor D Subbarao) ने ‘फ्रीबीज’ (Freebies) की राजनीति के खिलाफ चेतावनी दी है, क्योंकि यह चुनावी जीत तो दिला सकता है लेकिन राष्ट्र निर्माण में बाधक है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक पार्टियां अवास्तविक वादे करके एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही हैं, जिसका उदाहरण उन्होंने बिहार और आंध्र प्रदेश चुनावों से दिया है।
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बिहार में चुनावी वादों का किया जिक्र
बिहार विधानसभा के चुनावी वादों का जिक्र करते हुए बिजनेस टुडे (Business Today) पर छपी रिपोर्ट में टीओआई (TOI) के एक लेख से पूर्व आरबीआई गवर्नर सुब्बाराव (Former RBI Governor D Subbarao) के हवाले से कहा गया कि बिहार में एनडीए (NDA) ने चुनाव प्रचार के दौरान महिलाओं को 10,000 रुपये ट्रांसफर किए, तो वहीं विपक्षी महागठबंधन इससे कहीं ज्यादा आगे निकल गया और राज्य की हर महिला को 30,000 रुपये के साथ ही प्रत्येक परिवार के लिए एक सरकारी नौकरी का बड़ा वादा कर दिया था। सुब्बाराव के मुताबिक कि इन वादों में अवास्तविकता का भाव था, मानो राजनीतिक वर्ग ने सामूहिक रूप से सभी वित्तीय गणित को स्थगित कर दिया हो।
वादे पूरा करने के लिए जूझ रही सरकारें
डी सुब्बाराव (D Subbarao) ने तर्क देते हुए कहा कि मुफ्त चीजें एक-दूसरे को रद्द करती हैं। जब राजनीतिक पार्टियां पैसे बांटती है या बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है, तो हकीकत में उनका असर कम हो जाता है। इनके जरिए भले ही कुछ वोटों को प्रभावित किया जा सके, लेकिन व्यापक प्रतिस्पर्धी वादे एक-दूसरे को बेअसर कर देते हैं। उन्होंने आगे कहा कि जब वादे विश्वसनीयता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं, तो लोग उन पर विश्वास करना बंद कर देते हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि सबसे बड़ी समस्या यही है कि इस तरह की गारंटियों पर चुनी हुई सरकारें अब अपने वादों को पूरा करने में संघर्ष कर रही हैं।
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RBI के पूर्व गवर्नर (Former RBI Governor) ने आंध्र प्रदेश का जिक्र करते हुए कहा कि इस राज्य को यह एहसास हो रहा है कि उसकी कल्याणकारी योजनाएं कल्पना से कहीं ज्यादा महंगी हैं। वहीं तेलंगाना सालों से भारी-भरकम अनुदान देने के बाद बड़े राजकोषीय घाटे से जूझ रहा है।
लाखों लोग दैनिक आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं, कल्याणकारी खर्च जरूरी हैं
सितंबर 2008 से सितंबर 2013 तक आरबीआई गवर्नर रहे सुब्बाराव (Former RBI Governor D Subbarao) के मुताबिक, ऐसे देश में जहां लाखों लोग दैनिक आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं, कल्याणकारी खर्च जरूरी हैं, लेकिन नकद ट्रांसफर का अत्यधिक उपयोग, खासतौर पर जब उधार द्वारा वित्तपोषित हो, उन चीजों में निवेश को रोक देता है जो आजीविका में स्थायी रूप से सुधार कर सकते हैं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पैदा करना। हर मुफ्त चीज को राजनीतिक विफलता की स्वीकृति बताते हुए उन्होंने चेयरमैन माओ की लिखी पंक्ति का हवाला दिया। जिसमें उन्होंने कहा था कि, ‘किसी व्यक्ति को एक मछली दो, और आप उसे एक दिन के लिए खिलाओगे, जबकि उसे मछली पकड़ना सिखाओ, तो आप उसे जीवन भर खिलाओगे।