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हापुड़ बना आतंकियों का नया ‘सेफ जोन’, तालीम और कारोबार की आड़ में युवाओं को जाल में फंसाने का हुआ पर्दाफाश

By Sushil Sah 
Updated Date

हापुड़। उत्तर प्रदेश का हापुड़ जिला इन दिनों सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है। हाल ही में खुफिया विभागों और उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ते की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इसमें यह शांत दिखने वाला जिला संदिग्धों और आतंकियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में बदल रहा है। यहां तालीम और छोटे-मोटे कारोबार की आड़ लेकर देश विरोधी और असमाजिक तत्व, यहां के सीधे-साधे युवाओं को गुमराह कर हिंसक जिहाद के रास्ते पर धकेलने का घिनौना खेल खेल रहे हैं।

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सुरक्षा विशेषज्ञों और पुलिस को मिली जानकारी के मुताबिक, हापुड़ के इस तरह संदिग्ध गतिविधियों का केंद्र बनने के पीछे पांच मुख्य वजहें सामने आई हैं—

1. दिल्ली-NCR से निकटता और मुफीद भौगोलिक स्थिति

हापुड़ की भौगोलिक स्थिति इसे संदिग्धों के लिए बेहद अनुकूल बनाती है। देश की राजधानी दिल्ली और नोएडा-गाजियाबाद से सटे होने के कारण यहां से आना-जाना बहुत ही आसान है। संदिग्ध तत्व दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियों की सीधी नजरों से बचने के लिए हापुड़ को अपना बेस बनाते हैं और यहीं से अपने नेटवर्क को संचालित करते हैं।

2. दुर्गम खादर क्षेत्र का फायदा

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हापुड़ का एक बड़ा हिस्सा गंगा नदी के खादर यानी तटीय ग्रामीण इलाकों से जुड़ा है। यह क्षेत्र काफी बड़ा, घने जंगलों और कच्चे रास्तों से भरा है। दुर्गम भौगोलिक बनावट के कारण यहां पुलिस और स्थानीय खुफिया इकाई (Local Intelligence Unit) के लिए हर संदिग्ध गतिविधि पर चौबीसों घंटे नजर रख पाना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है और इसी का फायदा ये नेटवर्क उठाते हैं।

3. तालीम और मदरसों की आड़ में ‘ब्रेनवॉश’

जांच में यह खुलासा हुआ है कि बाहरी राज्यों से आने वाले संदिग्ध युवक स्थानीय धार्मिक शिक्षण संस्थानों या मदरसों में शिक्षक या छात्र के रूप में नामांकन कराते हैं। शुरुआत में वे बेहद सामान्य व्यवहार करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे स्थानीय युवाओं से नजदीकियां बढ़ाकर प्रतिबंधित संगठनों जैसे जैश-ए-मोहम्मद के मालिकों और आकाओं के वीडियो और भड़काऊ बयान दिखाकर उनका मानसिक रूप से ब्रेनवॉश यानी कट्टरपंथीकरण करना शुरू कर देते हैं।

4. छोटे कारोबारों का मुखौटा

सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने के लिए ये संदिग्ध कपड़े की फेरी, पंचर की दुकान, कबाड़ का काम या मजदूरी जैसे छोटे-मोटे धंधों को अपनाते हैं। एक आम और गरीब दुकानदार का मुखौटा होने के कारण पड़ोसियों और पुलिस को इन पर आसानी से शक नहीं हो पाता। इस कारोबार की आड़ में वे रात के अंधेरे में सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के जरिए पाकिस्तानी हैंडलर्स से अपना संबंध बनाए रखते हैं।

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5. टेरर फंडिंग का डिजिटल नेटवर्क

हालिया मामलों में यह भी देखा गया है कि ये असमाजिक तत्व न केवल युवाओं को कट्टरपंथी बना रहे हैं, बल्कि धार्मिक चंदे के नाम पर स्थानीय स्तर पर धन भी इकट्ठा कर रहे हैं। इस रकम को डिजिटल ट्रांजैक्शन और हवाला के जरिए देश विरोधी गतिविधियों और सीमा पार बैठे आकाओं तक पहुंचाने का काम भी लगातार किया जा रहा है।

एजेंसियां सतर्क, धरपकड़ तेज

आपको बता दे कि हापुड़ के बहादुरगढ़ और अन्य संवेदनशील इलाकों से जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े संदिग्धों की गिरफ्तारी के बाद यूपी पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियां पूरी तरह सतर्क हैं। जिले में पहले से बिना पुलिस सत्यापन के रह रहे बाहरी लोगों की पहचान के लिए एक व्यापक तलाशी अभियान शुरू कर दिया गया है। साथ ही स्थानीय लोगों से भी अपील की गई है कि वे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को दें ताकि उनपर कार्रवाई की जा सके।

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