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Kajri Teej 2026 : सांस्कृतिक वैभव और पौराणिक म​हत्व,सुहाग और आस्था का अद्भुत पर्व

By अनूप कुमार 
Updated Date

Kajri Teej 2026 : भारत की विविध संस्कृति में तीज पर्वों का विशेष स्थान है। इन्हीं में से एक है कजरी तीज, जिसे भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। कजरी तीज केवल एक व्रत नहीं, बल्कि सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति की जीवंत धरोहर है। यह पर्व आस्था के साथ-साथ लोक कला, संगीत और सामाजिक एकता का भी उत्सव है। कजरी तीज केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोक जीवन की भावनाओं का उत्सव है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, झूले झूलती हैं और पारंपरिक कजरी गीत गाकर अपनी खुशियों और भावनाओं को व्यक्त करती हैं।

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कजरी में प्रकृति और भावनाओं का संगम
बरसात के मौसम में जब बादल उमड़ते हैं और धरती हरियाली से भर जाती है, तब कजरी के स्वर वातावरण को भावपूर्ण बना देते हैं। इसमें कभी मायके की याद, कभी प्रियतम से मिलने की चाह और कभी ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना दिखाई देती है।

पौराणिक महत्व
मान्यता है कि कजरी तीज का संबंध माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ा है। कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।

कजरी और सगुण उपासना
सगुण भक्ति परंपरा में भक्त ईश्वर को एक साकार रूप में मानकर उनकी आराधना करता है। कजरी में भगवान शिव, माता पार्वती, श्रीकृष्ण और देवी-देवताओं की स्तुति से जुड़े अनेक गीत मिलते हैं।
इन कजरियों में भक्त अपने आराध्य से संवाद करता है। भगवान को अपना प्रिय, परिवार का सदस्य या जीवन का आधार मानकर प्रेम और श्रद्धा व्यक्त करता है। सावन में शिव भक्ति से जुड़ी कजरियां विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।

कजरी और निर्गुण उपासना
निर्गुण भक्ति में ईश्वर को निराकार और सर्वव्यापी माना जाता है। निर्गुण कजरी में बाहरी आडंबरों से दूर आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझाने का प्रयास किया जाता है।गांवों में इस अवसर पर लोक संगीत और नृत्य की परंपरा आज भी जीवंत है।

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संगीत में कजरी: लोकभावना से आध्यात्मिक साधना तक
भारतीय लोक संगीत की परंपरा में कजरी एक ऐसी मधुर विधा है, जिसमें सावन की हरियाली, विरह की पीड़ा, प्रेम की अनुभूति और भक्ति की गहराई एक साथ दिखाई देती है। उत्तर भारत, विशेष रूप से पूर्वांचल की धरती पर जन्मी कजरी ने लोक जीवन को अपनी भावनाओं और सुरों से समृद्ध किया है।

कजरी के प्रसिद्ध गायक: लोक संगीत की अमूल्य धरोहर
कजरी उत्तर भारत के लोक संगीत की एक ऐसी विधा है, जिसमें सावन की फुहार, विरह की वेदना, प्रेम की अनुभूति और भक्ति का भाव एक साथ दिखाई देता है। पूर्वांचल की मिट्टी से निकली कजरी को अनेक महान कलाकारों ने अपनी आवाज देकर देश-दुनिया तक पहुंचाया।

प्रसिद्ध कजरी गायक और कलाकार

1. गिरिजा देवी
बनारस घराने की महान गायिका गिरिजा देवी ने ठुमरी, दादरा और कजरी जैसी लोक एवं शास्त्रीय विधाओं को नई पहचान दी। उनकी आवाज में बनारस की लोक संस्कृति की मिठास सुनाई देती थी।

2. विंध्यवासिनी देवी
बिहार की प्रसिद्ध लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी ने लोकगीतों, विशेषकर कजरी को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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3. मालिनी अवस्थी
मालिनी अवस्थी ने उत्तर भारत के लोक संगीत को आधुनिक मंचों तक पहुंचाया। उनकी कजरी प्रस्तुतियों में लोक परंपरा और शास्त्रीयता का सुंदर मेल दिखाई देता है।

4. शारदा सिन्हा
बिहार की लोक गायिका शारदा सिन्हा ने कजरी सहित कई लोक विधाओं को अपनी मधुर आवाज से समृद्ध किया।
कजरी की भावपूर्ण पंक्तियां (मौलिक प्रस्तुति)
“सावन की बदरिया छाई, मन में उमंग जगाई,
माटी की खुशबू संग, कजरी ने धुन सुनाई।”
“झूले पड़े अमरइया में, गूंजे मधुर तराना,
लोक सुरों में बसता है, भारत का हर अफसाना।”

कजरी का आध्यात्मिक स्वर
कजरी केवल प्रेम और ऋतु का गीत नहीं है, बल्कि इसमें भक्ति की गहराई भी दिखाई देती है। कई कजरियों में भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। यही कारण है कि कजरी लोक संगीत के साथ-साथ आध्यात्मिक अनुभूति का भी माध्यम बन गई है।

कजरी भारत की लोक आत्मा की आवाज है। इसके सुरों में गांवों की खुशबू, सावन की हरियाली और भारतीय संस्कृति की भावनाएं जीवित हैं। प्रसिद्ध गायकों ने इसे अपनी कला से अमर बना दिया है और आज भी कजरी नई पीढ़ी को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

कजरी केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की भावनात्मक और आध्यात्मिक धरोहर है। इसमें प्रेम भी है, प्रकृति भी है और परमात्मा की अनुभूति भी। निर्गुण और सगुण दोनों धाराओं को अपने सुरों में समेटे कजरी आज भी लोक चेतना को जीवंत बनाए हुए है।

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