Maa Brahmacharini Ki Aarti : मां ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। ‘ब्रह्म’ का अर्थ है तपस्या और ‘चारिणी’ का अर्थ है आचरण करने वाली; अर्थात तप का आचरण करने वाली देवी ही ब्रह्मचारिणी हैं।मां ब्रह्मचारिणी को तप, त्याग और संयम का प्रतीक माना जाता है।
पढ़ें :- Hanuman Jayanti 2026 : हनुमान जयंती 2026 पर आज करें बजरंगबली की पूजा, जानें भोग और विधि-विधान
पौराणिक कथा
पूर्व जन्म और पुनर्जन्म
मां ब्रह्मचारिणी अपने पूर्व जन्म में राजा दक्ष की पुत्री माता सती थीं। सती के योगाग्नि में भस्म होने के बाद, उन्होंने अगला जन्म हिमालय राज हिमवान और माता मैना के घर में पुत्री पार्वती के रूप में लिया। जब देवी पार्वती बड़ी हुईं, तब देवर्षि नारद ने उन्हें उनके पूर्व जन्म के बारे में याद दिलाया और बताया कि यदि वह भगवान शिव को पुनः पति रूप में पाना चाहती हैं, तो उन्हें घोर तपस्या करनी होगी।
नारद जी के उपदेश के अनुसार, माता पार्वती ने महल के ऐशो-आराम त्याग दिए और वन में जाकर अत्यंत कठिन तपस्या शुरू की।
उन्होंने 1,000 वर्षों तक केवल फल-फूल खाकर बिताए। अगले 100 वर्षों तक उन्होंने केवल जमीन पर उगने वाले शाक (साग) पर जीवन निर्वाह किया। इसके बाद कई वर्षों तक वे केवल जमीन पर गिरे हुए बेलपत्र खाकर भगवान शिव की आराधना करती रहीं।
मां ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप
देवी का यह रूप अत्यंत शांत, सौम्य और तेजस्वी है। वे श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है। वे नंगे पैर चलती हैं और इनका कोई वाहन नहीं है।
पढ़ें :- Narak Chaturdashi 2026 : आज नरक चतुर्दशी पर करें यम दीपदान, नरक की यातनाओं से मिलेगी मुक्ति
मुख्य भोग
मां को शक्कर (चीनी) और मिश्री का भोग सर्वाधिक प्रिय माना जाता है।
पंचामृत
दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत अर्पित करना बेहद शुभ होता है।
सफेद मिठाइयां
दूध और शुद्ध घी से बनी सफेद मिठाइयां (जैसे पेड़ा या खीर) भी अर्पित की जा सकती हैं।
पढ़ें :- 07 नवम्बर 2026 का राशिफल: शनिवार के दिन इन राशि के लोगों को नौकरी और व्यापार में मिलेंगे लाभ के अवसर
ध्यान मंत्र:दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥