Navratri kanya pujan : नवरात्रि में कन्या पूजन (कंजक पूजन) मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के सम्मान और उनकी कृपा पाने के लिए किया जाता है। यह मुख्य रूप से अष्टमी या नवमी तिथि को किया जाता है। परंपरा के अनुसार 9 कन्याओं और साथ में 1 बालक (बटुक भैरव) को बैठाना सबसे शुभ माना जाता है।
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नवरात्रि में कन्या पूजन का पौराणिक महत्व
मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत पुराण के अनुसार, 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं में माता दुर्गा के नौ स्वरूप (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) समाहित होते हैं।
वहीं दुर्गा सप्तशती के अनुसार, महाअष्टमी या महानवमी के दिन मां दुर्गा की आराधना और हवन से पहले कन्याओं का पूजन करने का विशेष विधान है। माना जाता है कि बिना कन्या पूजन के नवरात्रि की पूजा अधूरी मानी जाती है।
अगर आप अष्टमी पर कन्या पूजन करते हैं तो आप 18 अक्टूबर को माता महागौरी की पूजा के बाद कन्या पूजन कर सकते हैं। अगर आप नवमी को कन्या पूजन करते हैं तो आप 19 अक्टूबर को कन्याओं को भोजन करा सकते हैं। पंचांग अनुसार दोनों ही दिन कन्या पूजन के लिए शुभ है।
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स्वागत सत्कार: कन्याओं के घर पधारने पर उनके पैर धोए जाते हैं, माथे पर तिलक लगाया जाता है और उन्हें आदरपूर्वक आसन पर बैठाया जाता है।
भोग प्रसाद: इन्हें पारंपरिक रूप से हलवा, पूरी और काले चने का सात्विक भोग लगाया जाता है।
विदाई आशीर्वाद: भोजन के बाद सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा या उपहार (जैसे वस्त्र, चूड़ियां या पुस्तक) देकर आशीर्वाद लिया जाता है