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Parivartini Ekadashi 2026 : परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु का ब्रह्मांडीय परिवर्तन , जानें अध्यात्मिक और पौराणिक महत्व

By अनूप कुमार 
Updated Date

Parivartini Ekadashi 2026 :  परिवर्तिनी एकादशी हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र तिथि है। हिंदू धर्म की सबसे पवित्र एकादशी में से एक, “पार्श्व एकादशी” हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन (एकादशी) को आती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह अगस्त या सितंबर महीने में आती है। यह एकादशी ‘चातुर्मास’ (Four months of sacred time) के समय पड़ने पर बहुत भाग्यशाली और शुभ मानी जाती है।

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आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से इस एकादशी का विशेष महत्व है क्योंकि इसे भगवान विष्णु के योग निद्रा के दौरान करवट लेने का दिन माना जाता है। इसे ‘पद्मा एकादशी’, ‘पार्श्व एकादशी’ या ‘जयंती एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक ग्रंथों, विशेष रूप से ब्रह्मवैवर्त पुराण में इस एकादशी की महिमा और कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

भगवान का करवट बदलना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) को भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद, भाद्रपद शुक्ल एकादशी को वे सोते हुए अपनी स्थिति बदलते हैं यानी बाईं से दाईं करवट लेते हैं। इसी ‘परिवर्तन’ के कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 21 सितंबर को रात में 8 बजे से प्रारंभ हो रही है। यह तिथि अगले दिन 22 सितंबर को रात 9 बजकर 43 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 22 सितंबर मंगलवार को रखा जाएगा।

वामन अवतार की कथा
इस एकादशी का संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार से भी है, इसलिए इसे ‘वामन एकादशी’ भी कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब असुर राजा महाबलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया, तब भगवान विष्णु ने एक छोटे ब्राह्मण (वामन) का रूप धारण किया। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। विशाल रूप धारण कर भगवान ने दो पगों में ही धरती और आकाश नाप लिया और तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु बलि की इस दानवीरता से प्रसन्न हुए और उसे पाताल लोक का राजा बनाकर स्वयं उसके रक्षक बन गए।

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