Pitru Paksha 2024 kusha : सनातन धर्म में पूर्वजों को सम्मान देने के लिए पितृपक्ष में तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। इस बार पितृ पक्ष 2024 की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा यानी कि 26 सितंबर 2026 से हो रही है। शास्त्रों के अनुसार पिंडदान करने के नियम है। मान्यता है कि विधि पूर्वक से पितरों को तर्पण और पिंडदान करने से पितर प्रसन्न होते है और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद। पिंडदान और तर्पण में कुश का बहुत महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, कुशा के बिना किया गया तर्पण और श्राद्ध अधूरा माना जाता है और इसे पितरों तक पहुंचाने का एक प्रतीकात्मक माध्यम माना जाता है।
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शुद्धता और पवित्रता
कुशा को सनातन परंपरा में सबसे पवित्र घास (दर्भ या डाभ) माना गया है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब गरुड़ देव स्वर्ग से अमृत कलश लेकर आ रहे थे, तब उन्होंने उसे कुछ समय के लिए कुशा घास पर रखा था, जिससे यह हमेशा के लिए पवित्र हो गई। इसे उंगली में पहनने से तन और मन की शुद्धि होती है।
त्रिदेवों का वास
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कुशा की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग (सिरे) में भगवान शिव का वास होता है। इसकी पवित्री धारण करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद मिलता है।
अनामिका उंगली में धारण करने का कारण
श्राद्ध और देव कार्यों के दौरान पवित्री को हमेशा दाएं हाथ की अनामिका (तीसरी उंगली) में पहना जाता है। हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार अनामिका के ठीक नीचे ‘सूर्य पर्वत’ होता है, जो तेज, स्वास्थ्य और यश का कारक है। कुशा पहनने से सूर्य तत्व जाग्रत होता है और हमारे शरीर में ऊर्जा का प्रवाह सही रहता है।
धारण करने का मंत्र
तर्पण करते समय ‘ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ’ मंत्र का उच्चारण करते हुए इसे अनामिका उंगली में पहना जाता है।
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विसर्जन
तर्पण या पिंडदान समाप्त होने के बाद कुशा की पवित्री को आदरपूर्वक अलग रख देना चाहिए। इसे कभी भी पैरों में नहीं आने देना चाहिए और न ही कूड़ेदान में फेंकना चाहिए।