नई दिल्ली। मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) पर छिड़े सियासी संग्राम के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की गोवा पीठ (Goa Bench) ने एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने गुरुवार (5 नवंबर) को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को आदेश दिया कि वह एक परिवार के उन छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची में शामिल करे, जिन्हें गोवा में हाल ही में हुए SIR के दौरान अंतिम मतदाता सूची से हटा दिया गया था। चार दिनों तक चली लंबी सुनवाई के बाद, जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने गुरुवार को अपना फैसला सुनाया।
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पीठ ने कहा कि हम याचिका स्वीकार करते हैं। हमने ECI के इस तर्क को खारिज कर दिया है कि इस याचिका पर सुनवाई टाल दी जानी चाहिए क्योंकि SIR का मामला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में लंबित है। यह मामला SIR से जुड़ा नहीं है। इसलिए, हम गोवा के सांताक्रूज निर्वाचन क्षेत्र के BLO को आदेश देते हैं कि वे आज से 10 दिनों के भीतर याचिकाकर्ताओं के नाम मतदाता सूची में जोड़ दें।
इसके बाद ECI के वकील गौरीश अग्नि ने इस आदेश पर रोक (स्टे) लगाने की मांग की लेकिन अदालत ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि “कोई रोक नहीं। हम मतदाता सूची में नाम शामिल करने पर रोक कैसे लगा सकते हैं! आप सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से जाकर रोक ले आइए। यह आदेश उन मतदाताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर दिया गया, जिन्होंने मतदाता सूची से अपना नाम हटाए जाने और ‘फॉर्म 8’ आवेदनों को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
इससे पहले, ECI ने अदालत से इस मामले की सुनवाई टालने का अनुरोध किया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला दिया, जिसमें हाई कोर्ट से रिट याचिकाओं की कार्यवाही को फिलहाल रोके रखने (स्थगित रखने) को कहा गया था। ECI का तर्क था कि गोवा में दी गई चुनौती पूरी SIR प्रक्रिया से जुड़ी है, जिसमें मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया भी शामिल है। हालांकि, अदालत ने प्रथम दृष्टया यह माना कि मौजूदा कार्यवाही अन्य जगहों पर चल रही SIR संबंधी चुनौतियों से अलग है, क्योंकि गोवा में पुनरीक्षण प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है।
बार एंड बेंच के मुताबिक, पीठ ने कहा कि अपील के स्तर पर आवेदनों का खारिज होना, असल में शुरुआत में नाम हटाए जाने का ही परिणाम है। सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट ने ECI की उस स्वचालित (ऑटोमेटेड) प्रणाली की भी आलोचना की, जो ‘फॉर्म 8’ के तहत पते में बदलाव के आवेदनों को बिना सोचे-समझे (यांत्रिक तरीके से) खारिज कर देती है। पीठ ने टिप्पणी की कि मतदाताओं से उनके पुराने निवास स्थान के लिए ‘एन्यूमरेशन फॉर्म’ (गणना प्रपत्र) पर हस्ताक्षर करवाना, उन्हें एक तरह से गलत घोषणा करने के लिए मजबूर करने जैसा है।
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पीठ ने सवाल उठाया कि क्या इस तरह की स्वचालित अस्वीकृतियां एक समावेशी मतदाता सूची को कमजोर नहीं करतीं? अदालत ने सुझाव दिया कि आवेदनों को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उन्हें कुछ समय के लिए लंबित (होल्ड पर) रखा जाना चाहिए, ताकि जो मतदाता वास्तव में दूसरी जगह चले गए हैं, वे अपने मताधिकार से वंचित न रह जाएं। कोर्ट ने अपनी संशोधन प्रक्रिया को सही ठहराने के लिए ‘जनभावना’ का हवाला देने पर ECI को फटकार लगाई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी कार्यवाही बाहरी जनधारणा के बजाय पूरी तरह से वैधानिक कानूनों के अनुसार ही होनी चाहिए।