नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग पूर्व सैनिकों को मिलने वाले पेंशन और अन्य लाभों के मामलों में केंद्र सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। 15 सितंबर 2026 को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने केंद्र की 271 अपीलों को खारिज कर दिया जो दिव्यांगता पेंशन से जुड़े थे।
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सर्वोच्च अदालत ने 2015 की रक्षा मंत्री समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दिव्यांग सैनिकों को कई बार तकनीकी आधारों पर उनको इसका लाभ नहीं मिला। बता दें कि रिपोर्ट में ऐसे मामलों में लंबित अपीलों को वापस लेने की सिफारिश की गई थी, लेकिन अदालत ने कहा कि इस सिफारिश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि यदि किसी पूर्व सैनिक की दिव्यांगता सैन्य सेवा के कारण हुई या सेवा के दौरान बढ़ी है, तो उसे दिव्यांगता पेंशन का लाभ देने के मामले में दिव्यांग सैनिक पर अनावश्यक सबूत का बोझ नहीं डाला जा सकता। कोर्ट के अनुसार, यह साबित करने की जिम्मेदारी कि दिव्यांगता सैन्य सेवा से संबंधित नहीं है, नियोक्ता यानी सरकार या सेना पर रहती है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को उन न्यायिक आदेशों का पालन करने का निर्देश दिया, जिनमें पूर्व सैनिकों को दिव्यांगता पेंशन देने का फैसला किया गया है। इसके लिए केंद्र को चार महीने का समय दिया गया है।
अदालत ने इस फैसले में पेंशन नियमों में पारदर्शिता, स्पष्टता और निश्चितता की जरूरत पर भी जोर दिया। जिससे दिव्यांग पूर्व सैनिकों को अपने अधिकारों के लिए लंबे समय तक अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें। सर्वोच्च अदालत का यह फैसला दिव्यांग पूर्व सैनिकों से जुड़े लंबित पेंशन मामलों और सरकार की अपीलों के निपटारे के संदर्भ में अहम है। कोर्ट ने सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि पात्र पूर्व सैनिकों को न्यायिक आदेशों के अनुरूप उनके लाभ समय पर मिलें।