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भारत में हर गांव में था एक गुरुकुल, 97 फीसदी थी साक्षरता दर : देव प्रकाश शुक्ला

By santosh singh 
Updated Date

अमेठी। भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है। 18वीं शताब्दी में जब देश की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी, उस समय औसतन 300 व्यक्तियों पर एक गुरुकुल के हिसाब से पूरे भारतवर्ष में लगभग 7 लाख 32 हज़ार गुरुकुल संचालित हो रहे थे। यही संख्या उस समय भारत में कुल गांवों की थी, यानी प्रत्येक गांव में एक गुरुकुल।

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गुरुकुलों को लेकर यह भ्रांति है कि वहां केवल संस्कृत पढ़ाई जाती थी, जबकि वास्तव में वहाँ विज्ञान की 20 से अधिक शाखाओं की पढ़ाई होती थी। इनमें खगोल शास्त्र, नक्षत्र शास्त्र, बर्फ़ बनाने का विज्ञान, धातु शास्त्र, रसायन शास्त्र, स्थापत्य शास्त्र, वनस्पति विज्ञान, नौका शास्त्र, यंत्र विज्ञान जैसी विधाएं प्रमुख थीं। इसके अतिरिक्त शौर्य एवं युद्ध शिक्षा भी भरपूर मात्रा में दी जाती थी।

संस्कृत मुख्यतः माध्यम की भाषा थी और वेद-उपनिषदों के अध्ययन के साथ छात्रों का चरित्र एवं संस्कार निर्माण भी होता था। बालक के 5 वर्ष, 5 माह, 5 दिन पूरे होते ही उसे गुरुकुल में प्रवेश दिया जाता था। सूर्योदय से सूर्यास्त तक 14 वर्षों तक नियमित अध्ययन होता था और नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करने के बाद बालक आत्मनिर्भर होकर समाज और राष्ट्र सेवा के लिए सक्षम बनता था।

1822 में अंग्रेजों के सर्वेक्षण में भी यह दर्ज हुआ कि भारत में ऐसा कोई गांव नहीं था। जहां गुरुकुल न हो और ऐसा कोई बालक नहीं था जो शिक्षा ग्रहण न करता हो। शिक्षाशास्त्री लुडलो ने अपने 16-17 वर्षों के भारत प्रवास में यह तथ्य स्पष्ट किया। इसी शिक्षा प्रणाली के बल पर भारत की साक्षरता दर 97 फीसदी (Literacy Rate 97 Percent) थी, लेकिन अंग्रेजों के भारत आगमन के बाद स्थिति बदली। टी. बी. मैकाले ने अपने अध्ययन में पाया कि भारत की शक्ति उसकी संस्कृति, शिक्षा और सभ्यता में है। यही से शूरवीर और क्रांतिकारी जन्म लेते हैं, इसीलिए “Indian Education Act” बनाकर गुरुकुलों को बंद करा दिया गया।

विडंबना यह है कि जब भारत में हर गांव शिक्षा का केंद्र था, तब इंग्लैंड में आम जनता के लिए पहला सार्वजनिक विद्यालय 1868 में खुला। उससे पहले वहां शिक्षा केवल राजपरिवार और महलों तक सीमित थी।

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आज दुर्भाग्य है कि हम अपने श्रेष्ठ सृजनात्मक पुरुषों और गौरवशाली शिक्षा प्रणाली को भूल चुके हैं। विदेशियत के प्रभाव और हीनभावना से ग्रस्त बुद्धिजीवी वर्ग अपने ही अतीत पर गर्व नहीं कर पा रहा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय युवा वाहिनी एवं राष्ट्रीय युवा वाहिनी नेशनल वालंटियर भाजपा हिंदू देव प्रकाश शुक्ला ने कहा कि भारत को उसके प्राचीन शिखर पर ले जाने के लिए राजनेताओं में अब वह साहस दिखाई नहीं देता।

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