नई दिल्ली। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन के कमिश्नर तुकाराम मुंढे (Maharashtra FDA Commissioner Tukaram Mundhe) ने केंद्रीय अधिकारियों से अस्पताल में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले मेडिकल डिवाइस की कीमतों की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। राज्य के एक सर्वे में कुछ मामलों में खरीद की कीमत पर 2,841 फीसदी तक ज्यादा दाम (मार्कअप) लगाए जाने का पता चला है। यह जानकारी मिंट की रिपोर्ट में दी गई है।
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बीते 10 अगस्त को मुंढे ने डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स (Department of Pharmaceuticals) और नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को एक पत्र भेजा है। पत्र में मुंढ़े ने इन नतीजों की समीक्षा और उचित रेगुलेटरी कार्रवाई की मांग की। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावों में ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करना या जरूरी डिवाइस कैटेगरी को एक तय कीमत निगरानी व्यवस्था के तहत लाना शामिल था।
MRP से की गई खरीद दाम की तुलना
मिंट ने बताया कि उसने इस पत्र की समीक्षा की है। इसका शीर्षक था ‘मेडिकल डिवाइस (IPD में इस्तेमाल होने वाले सर्जिकल आइटम) की खरीद और बिक्री की कीमतों में अंतर पर मार्केट सर्वे रिपोर्ट’।
सर्वे में इनपेशेंट केयर (अस्पताल में भर्ती मरीजों की देखभाल) में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों को शामिल किया गया। इनमें इंट्रावेनस इन्फ्यूजन सेट, सिरिंज, नेबुलाइजर, ऑक्सीजन मास्क और कैथेटर शामिल हैं। इसमें निजी अस्पतालों की ओर से उत्पादों की खरीद की कीमतों की तुलना उनके प्रिंटेड मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) या मरीजों से लिए गए बिल की रकम से की गई।
₹11.05 की खरीद, ₹325 का बिल
सर्वे में पाया गया कि निजी अस्पतालों ने 310 रुपये के एमआरपी वाले कैथेटर 29.41 रुपये प्रति पीस के हिसाब से खरीदे। ‘मिंट’ के आंकड़ों के अनुसार, 11.05 रुपये में खरीदे गए IV इन्फ्यूजन सेट का बिल मरीजों को 325 रुपये का दिया गया।
मुंढे ने अखबार को बताया कि कुछ मामलों में खरीद की कीमत और MRP के बीच का अंतर 2,841 फीसदी तक पहुंच गया। उन्होंने मार्जिन को सही करने, अलग-अलग एजेंसियों के बीच समीक्षा करने और खरीद की लागत और घोषित MRP के बीच के अंतर को कंट्रोल करने वाले दिशानिर्देश बनाने की मांग की।
मुंढे ने ‘मिंट’ से कहा कि यह सिर्फ कीमत का मामला नहीं है। यह मरीजों की सुरक्षा का मामला है।’ उन्होंने कहा कि मरीजों के पास अक्सर यह पता लगाने के लिए जरूरी जानकारी नहीं होती कि अस्पताल के किसी उत्पाद के लिए ली गई कीमत उचित है या नहीं।
एनपीपीए की जांच जारी
इस मामले से वाकिफ दो अधिकारियों ने ‘मिंट’ को बताया कि NPPA इस बात की जांच कर रही है कि क्या निर्माता और बिचौलिए मरीजों तक उत्पाद पहुंचने से पहले भारी मार्जिन जोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि अथॉरिटी कंपनियों की फाइलिंग और अंदरूनी प्राइस लिस्ट की तुलना महाराष्ट्र के सर्वे से कर रही है।
अधिकारियों ने अखबार को यह भी बताया कि एनपीपीए को पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु के ड्रग-कंट्रोल अधिकारियों से भी इसी तरह की शिकायतें मिली हैं। ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 के तहत, NPPA तय दवाओं (शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन) और खास मेडिकल डिवाइस के लिए अधिकतम कीमत (सीलिंग प्राइस) तय करता है। जो दवाएं या प्रोडक्ट इस लिस्ट में नहीं हैं (नॉन-शेड्यूल्ड), उनकी निगरानी पैराग्राफ 20 के तहत की जाती है।
इसके तहत 12 महीने की अवधि में एमआरपी में 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं की जा सकती। एनपीपीए की गाइडलाइंस के मुताबिक, यह सिस्टम सालाना कीमत बढ़ोतरी पर नजर तो रखता है, लेकिन हर डिवाइस कैटेगरी के लिए एक जैसी अधिकतम कीमत तय नहीं करता।
रेगुलेटर ले चुका है यह एक्शन
रेगुलेटर ने पहले कोरोनरी स्टेंट और घुटने के इम्प्लांट सिस्टम जैसी कैटेगरी पर सीधे कीमत नियंत्रण लागू किया है। एनपीपीए के मेडिकल-डिवाइस प्राइसिंग रिकॉर्ड के अनुसार, कोरोना महामारी के दौरान, इसने ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले कई डिवाइस के लिए ट्रेड-मार्जिन को तर्कसंगत बनाने (ट्रेड-मार्जिन रैशनलाइजेशन) का तरीका भी अपनाया था।
आकाश हेल्थकेयर के एमडी डॉ. आशीष चौधरी (Dr. Ashish Chaudhry, MD of Akash Healthcare) ने ‘मिंट’ को बताया कि रेगुलेशन से पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलना चाहिए। साथ ही अस्पतालों को आर्थिक रूप से टिकाऊ बने रहने और इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी और मरीजों की सुरक्षा में निवेश करने की गुंजाइश भी मिलनी चाहिए।
अस्पताल की कीमतों से जुड़ा यह मामला इस साल की शुरुआत में मुंबई के फूड सेक्टर में महाराष्ट्र FDA के एनफोर्समेंट ड्राइव के बाद सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, मुंढे के नेतृत्व में हुई जांच के दौरान साफ-सफाई के नियमों के उल्लंघन की वजह से कई खाने-पीने की जगहों को कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा था।
रिपोर्ट के बताया गया कि संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों, डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स, NPPA और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (Central Drugs Standard Control Organisation) को भेजे गए सवालों का खबर छपने के समय तक कोई जवाब नहीं मिला था। रिपोर्ट में जिन राज्य अधिकारियों का जिक्र किया गया है, उनसे पूछे गए सवालों का भी कोई जवाब नहीं मिला।