Election Commission Rift : भारत चुनाव आयोग में कथित तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ बाकी दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के मतभेदों की खबरों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस मामले पर विपक्षी दलों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कठपुतली होने और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है।
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‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने बुधवार को एक्स पोस्ट में लिखा, ‘मोदी के चहेते ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में अपनी मनमर्जी चला रहे हैं। इस बारे में खुद दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार शिकायत की है। शिकायत में साफ कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्त – सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी नहीं दी जाती। उनसे सलाह नहीं ली जाती। उनसे बिना पूछे या बताए हुए फैसले लिए जा रहे हैं। ये 14 शिकायतें मुख्य तौर से – SIR, फॉर्म 6 में बदलाव, नए वोटर का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाना और जोड़ना, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील, वोटर लिस्ट की सुरक्षा और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर है।’
देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी ने आगे लिखा, ‘इन शिकायतों से साफ होता है कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में सिर्फ ज्ञानेश कुमार की चल रही है। ज्ञानेश अपने बॉस मोदी की तरह तानाशाही कर रहे हैं और मोदी को खुश करने के लिए ‘वोट चोरी’ का काम कर रहे हैं। हम पहले भी कहते आए हैं – मोदी ने चुनाव आयोग पर कब्जा कर रखा है। ज्ञानेश कुमार मोदी के हाथ की कठपुतली है। इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से ये बात साबित होती है। मोदी और ज्ञानेश ने मिलकर देश के लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुंचाया है। लेकिन ये बात याद रखना – वक्त आने पर सबका हिसाब होगा, जवाबदेही तय होगी। इस अपराध की सजा जरूर मिलेगी।’
क्या है पूरा मामला?
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दरअसल, भारत चुनाव आयोग तीन लोगों से मिलकर बनता है जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा, दो चुनाव आयुक्त भी होते हैं और ये तीनों मिलकर फैसले लेते हैं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक जांच से पता चला है कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं। कमिश्नर सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी का आरोप है कि अहम फैसले उनकी जानकारी या मंज़ूरी के बिना लिए गए। यह अंदरूनी मतभेद ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) पर केंद्रित है, जिसका असर 13 करोड़ मतदाताओं के नामों पर पड़ रहा है। चुनाव आयुक्तों ने नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए ‘फॉर्म 6’ में किए गए ‘अनधिकृत और गैर-कानूनी’ बदलावों को चुनौती दी और IT डिवीज़नों के ज़रिए वोटर लिस्ट डेटाबेस के “धीरे-धीरे सेंट्रलाइज़ेशन” को लेकर चिंताएँ जताई गई हैं।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक जांच से पता चला है कि इसी दौरान कई बार तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग (EC) के भीतर ही इन मुद्दों पर सवाल उठाए गए थे। ये सवाल आयोग के तीन चुनाव आयुक्तों में से दो — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने उठाए थे। SIR को पूरे देश में लागू करने का काम तीनों आयुक्तों की देखरेख में हुआ है। लेकिन संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार — एक ही दिन में चार बार — उन फैसलों और आदेशों पर औपचारिक रूप से (रिकॉर्ड पर) आपत्ति जताई है, जो उनके मुताबिक उनकी जानकारी के बिना लिए या जारी किए गए थे। यह मामला बहुत अहम है।