Kachnar Plants : ‘कचनार’ के पौधे का औषधीय महत्व है। आयुर्वेद में इसे प्रकृति का अनोखा खजाना कहा गया है। जोड़ों के दर्द हो या थायराइड, गांठों की समस्या से लेकर पेट के पाचन को दुरुस्त करने तक ‘कचनार’ जादुई असर दिखाता है। ‘कचनार’ में अनगिनत फायदे छिपे हैं। वैसे तो ये पूरी दुनिया में पाया जाता है ,भारत में खास तौर पर पहाड़ी इलाकों में इसे बहुत पसंद किया जाता है और हिमाचल प्रदेश इसका एक प्रमुख स्थान है। इस पौधे का वैज्ञानिक नाम ‘बौहिनिया वैरीगेटा’ है
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त्वचा रोगों में कारगर
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेस (International Journal of Pharmaceutical Sciences) में छपी एक स्टडी के मुताबिक, इस पौधे का आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और पारंपरिक चीनी चिकित्सा (Traditional Chinese Medicine) में मधुमेह, सूजन, श्वसन संबंधी समस्याओं और त्वचा रोगों जैसे विभिन्न रोगों के उपचार में कारगर बना गया है। इसके औषधीय महत्व के अलावा, बी. वेरिएगाटा कई क्षेत्रों में सांस्कृतिक महत्व भी रखता है। इसे अक्सर इसकी सुंदरता और प्रतीकात्मक मूल्य के लिए सम्मानित किया जाता है।
मां सरस्वती को अर्पित किया जाता है
कचनार के फूलों का उपयोग धार्मिक समारोहों, त्योहारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता है। इसका सांस्कृतिक महत्व भी है। हमारे देश में देवी लक्ष्मी और मां सरस्वती को अर्पित किया जाता है।
अपच को दूर करने में मददगार
आयुर्वेद के विभिन्न ग्रंथों में इसका जिक्र है। चाहे वह इसकी छाल हो, फूल हो या पत्तियां या अन्य हिस्सा, यह एक दवा की तरह काम करता है। ‘कचनार’ की सब्जी पेट के पाचन में सुधार करती है, जो कब्ज, गैस और अपच को दूर करने में मददगार साबित होती है।
एंटीसेप्टिक गुण
‘कचनार’ के फूल और छाल में एंटीसेप्टिक गुण पाए जाते हैं, जो खुजली, फोड़े-फुंसियों और दाद जैसी त्वचा संबंधित समस्याओं को राहत दिलाती है। साथ ही, इसे थायराइड और गांठों को ठीक करने में असरदार माना जाता है।
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यह रक्त-पित और इससे जुड़ी समस्याओं को दुरुस्त करने वाला माना गया है।
स्वाद
‘कचनार’ की सब्जी भी बनाई जाती है। हिमाचल में इसे स्थानीय भाषा में ‘कराली’ या ‘करयालटी’ कहा जाता है। इसका स्वाद थोड़ा सा कड़वा होता है, लेकिन पकने के बाद यह खाने में बेहद ही स्वादिष्ट होता है।