Lord Hanuman Appears to Saint Tulsidas : संत तुलसीदास ने ने 16वीं शताब्दी (विक्रम संवत 1631/1574 ईस्वी) में अवधी भाषा में महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ ( ‘Ramcharitmanas’) की रचना अयोध्या में शुरू की थी। संत तुलसी दास केबारे में कहा जाता है उन्हें हनुमान जी के दर्शन हुए और प्रभु श्रीराम के भी दर्शन हुए। एक बार वाराणसी (काशी) में संत तुलसी दास की हनुमान जी से एक विशेष भेंट हुई।
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पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसीदास जी की हनुमान जी से मुलाकात एक प्रेत (ब्रह्मपिशाच) के माध्यम से हुई थी, जो उन्हें हनुमान जी का पता बताने के लिए सहमत हुआ था।
काशी में कथा के दौरान, तुलसीदास जी ने हनुमान जी को कोढ़ी के रूप में पहचान लिया और उनके चरण पकड़ लिए, जिसके बाद हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए और चित्रकूट में राम जी से मिलने का मार्ग बताया।
मुलाकात की कहानी
प्रेत ने बताया पता
तुलसीदास जी अपनी राम कथा के दौरान एक बूढ़े कोढ़ी व्यक्ति को हमेशा सबसे पहले आते और सबसे अंत में जाते हुए देखते थे। कहते हैं कि एक प्रेत ने तुलसीदास जी को बताया कि यह कोढ़ी रूपी व्यक्ति ही हनुमान जी हैं।
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जंगल में उनके चरण पकड़
एक दिन, कथा के बाद, तुलसीदास जी ने उस वृद्ध का पीछा किया और जंगल में उनके चरण पकड़ लिए। जब कोढ़ी ने बचने की कोशिश की, तो तुलसीदास जी ने दृढ़ता से कहा कि वे उन्हें पहचान चुके हैं।
महाबली हनुमान जी का प्रकट होना: तुलसीदास जी के समर्पण को देखकर हनुमान जी ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया।
श्रीराम दर्शन का वरदान
हनुमान जी ने उनसे वरदान मांगने को कहा, तो तुलसीदास जी ने प्रभु राम के दर्शन की इच्छा जताई। हनुमान जी ने उन्हें चित्रकूट जाने की सलाह दी, जहाँ उन्हें राम जी के दर्शन हुए।
यह स्थान आज वाराणसी में संकट मोचन मंदिर (Sankat Mochan Temple) के रूप में जाना जाता है।
हनुमान जी, तुलसीदास के भगवान राम के प्रति प्रेम से द्रवित होकर, अंततः अपने असली रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने तुलसीदास से कहा कि वह चित्रकूट जाएँ, जहाँ उन्हें भगवान राम के दर्शन होंगे।