Saptashrungi Mata Temple : महाराष्ट्र के नासिक जिले में वणी के पास स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण शक्तिपीठ सप्तश्रृंगी माता हैं। यह मंदिर सह्याद्री पर्वत श्रृंखला की सात चोटियों (सप्त श्रृंग) के बीच समुद्र तल से लगभग 4800 फीट की ऊंचाई पर बसा हुआ है। सप्तश्रृंगी माता को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता दुर्गा के स्वरूप की पूजा होती है। इस देवी भागवत पुराण और हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस स्थल पर देवी सती का दाहिना हाथ गिरा था। स्वयंभू माता अठारह भुजाओं (अष्टादश देवी) के साथ महिषासुर मर्दिनी रूप में विद्यमान हैं।
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सती का अंग गिरना
मान्यता है कि जब सती का शरीर भगवान शिव लेकर घूम रहे थे, तब उनके शरीर के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे। सप्तश्रृंगी में माता का दाहिना हाथ (या भुजा) गिरा था।
स्वयंभू मूर्ति की मान्यता
यहां की मूर्ति को स्वयंभू (अपने आप प्रकट हुई) माना जाता है, जिसे किसी इंसान ने नहीं बनाया।
18 भुजाओं वाली माता
माता की मूर्ति में 18 हाथ (भुजाएं) हैं, जिनमें अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र हैं—यह शक्ति और रक्षा का प्रतीक है।
रामायण से जुड़ी कथा
कहा जाता है कि राम , लक्ष्मण और माता सीता ने वनवास के दौरान यहां माता के देवी की पूजा की और दर्शन किए थे।
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दुर्गा सप्तशती का संबंध
यह स्थान दुर्गा सप्तशती से भी जुड़ा है, जिसमें देवी की शक्ति और राक्षसों के वध का वर्णन मिलता है।
मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता
भक्त मानते हैं कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर इच्छा पूरी होती है।
सप्तशृंगी मंदिर में अनुष्ठान और उत्सव
सप्तशृंगी मंदिर में होने वाले अनुष्ठान और उत्सव यहाँ की संस्कृति और परंपरा का एक अभिन्न अंग हैं। ये अनुष्ठान भक्तों की सप्तशृंगी देवी के प्रति श्रद्धा और उनकी महिमा का गुणगान करने के उनके उल्लास को दर्शाते हैं।
सप्तशृंगी मंदिर में होने वाले दैनिक अनुष्ठान को ‘अभिषेक’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है “स्नान कराना”। इसमें सप्तशृंगी देवी की प्रतिमा पर ‘पंचामृत’ (दूध, दही, शहद, चीनी और घी का मिश्रण) चढ़ाया जाता है और फिर उसे एक वस्त्र से पोंछा जाता है। यह अभिषेक पुजारियों द्वारा दिन में चार बार किया जाता है: सूर्योदय के समय, दोपहर में, सूर्यास्त के समय और मध्यरात्रि में।
भक्तों को ‘प्रसाद’ (पवित्र भोजन) वितरित किया जाता है। इस प्रसाद में पके हुए चावल होते हैं, जिनमें चीनी या गुड़ मिला होता है।