आज के डिजिटल दौर में प्राइवेसी और प्रेस की आजादी के बीच टकराव अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। 'डिजिटल समाचार प्रकाशक संघ' (DNPA) ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन यानी DPDP Act, 2023 और उससे जुड़े नियमों के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है। संघ का दावा है कि इन प्रावधानों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म, व्हिसलब्लोअर और पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों पर काफी असर पड़ सकता है।
नई दिल्ली। आज के डिजिटल दौर में प्राइवेसी और प्रेस की आजादी के बीच टकराव अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ‘डिजिटल समाचार प्रकाशक संघ’ (DNPA) ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन यानी DPDP Act, 2023 और उससे जुड़े नियमों के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है। संघ का दावा है कि इन प्रावधानों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म, व्हिसलब्लोअर और पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों पर काफी असर पड़ सकता है।
इस कानूनी चुनौती का हिस्सा 21 प्रमुख न्यूज पब्लिशर्स हैं। इनमें Network18, NDTV, The Indian Express और Times Internet जैसे बड़े मीडिया समूह शामिल हैं। बता दें कि याचिका 6 अक्टूबर को दायर की गई थी और मामले पर 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई सूचीबद्ध है।
क्या है DNPA की मुख्य आपत्ति?
DNPA का कहना है कि DPDP Act के तहत डेटा इस्तेमाल करने से पहले नोटिस और सहमति जैसी शर्तें पत्रकारिता के काम में बड़ी मुश्किल पैदा कर सकती हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई पत्रकार किसी व्यक्ति या संस्था की जांच कर रहा है और उसे पहले ही इसकी जानकारी देकर सहमति लेनी पड़े, तो इससे जांच प्रभावित हो सकती है। साथ ही सबूत मिटाने या गवाहों पर दबाव डालने का खतरा पैदा हो सकता है।
पब्लिशर्स ने डेटा मिटाने से जुड़े अधिकार को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि इसका इस्तेमाल प्रकाशित खबरों या जांच से जुड़ी जानकारी को हटाने की मांग के लिए किया जा सकता है। इससे सार्वजनिक हित में की जाने वाली रिपोर्टिंग और न्यूज आर्काइव प्रभावित होने की आशंका है।
पत्रकारों के सूत्रों को लेकर भी चिंता
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इस याचिका में सरकार की ओर से डेटा की मांग किए जाने से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए गए हैं। DNPA का कहना है कि ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल होने पर पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान सामने आने का खतरा हो सकता है। इससे भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट गड़बड़ी या अन्य सार्वजनिक हित के मामलों में व्हिसलब्लोअर्स के सामने आने पर भी असर पड़ सकता है।
किन प्रावधानों को चुनौती?
DNPA ने DPDP Act की कई धाराओं—Section 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3)—के साथ DPDP नियम की नियम 16, 17 और 23 को चुनौती दी है। एसोसिएशन का कहना है कि पत्रकारिता को एक अलग संरक्षित गतिविधि के तौर पर पर्याप्त छूट नहीं दी गई है और यह संविधान के Article 14 और Article 19(1)(a) के तहत मिले अधिकारों से टकराता है।
मई 2027 से बढ़ सकती है अहमियत
DPDP कानून का बड़ा हिस्सा चरणबद्ध तरीके से लागू होना है। साथ ही कई महत्वपूर्ण प्रावधान मई 2027 से प्रभावी होने वाले हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि डेटा प्राइवेसी और नागरिकों के निजता अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने DNPA की दलीलों पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसलिए “प्रेस की आजादी पर हमला” DNPA की ओर से उठाई गई संवैधानिक आपत्ति है। यह न्यायालय का निष्कर्ष नहीं है।