Advertisement
  1. हिन्दी समाचार
  2. देश
  3. Assam Election Results: असम में एक बार फिर बनेंगे हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री, जानिए कैसे हुई इनकी राजनीति में एंट्री

Assam Election Results: असम में एक बार फिर बनेंगे हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री, जानिए कैसे हुई इनकी राजनीति में एंट्री

By शिव मौर्या 
Updated Date

Assam Election Results: असम विधानसभा चुनाव के नतीजे आने शुरू हो गए हैं। बीजेपी असम में एक बार फिर से प्रंचड बहुमत से सरकार बना रही है और असम में एक बार फिर हिमंत बिस्व सरमा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। दरअसल, 126 सीट वाली असम विधानसभा में भाजपा बहुमत का आंकड़ा पार कर गई है, जबकि उसके मुकाबले कांग्रेस काफी पीछे छूट गई। काउटिंग में बीजेपी 97 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं, कई सीटों के अब नतीजे आने शुरू हो गए हैं।

पढ़ें :- Assembly Election 2026 Result: पांच राज्यों में वोटों की गिनती शुरू, देखें - रुझानों में कहां कौन आगे

दरअसल, ये पहली बार नहीं है जब हिमंत बिस्वा सरमा भाजपा का झंडा बुलंद कर रहे हैं। वह ये काम 2016 से ही करते आ रहे हैं। यह बात अलग है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनने का पहला मौका 2021 में मिला था। वहीं, अब एक बार फिर वो असम के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी भूमिका निभायेंगे।

हिमंत बिस्व सरमा के बारे में जानिए
हिमंत बिस्व सरमा मौजूदा समय असम के मुख्यमंत्री हैं और उनका जन्म एक फरवरी 1969 को जोरहाट में हुआ था। बाद में उनका परिवार गुवाहाटी के उलुबारी और गांधीबस्ती इलाके में बस गया। उनका परिवार मूल रूप से नलबाड़ी जिले के लतीमा से ताल्लुक रखता है और उनके छह भाई-बहन हैं। राजनीति में औपचारिक रूप से प्रवेश करने से पहले का उनका सफर शिक्षा, छात्र नेतृत्व और वकालत से जुड़ा रहा है।

छात्र राजनीति से की थी शुरूआत
हिमंत बिस्व सरमा ने अपनी राजनीति की शुरूआत छात्र राजनीति से की थी। छात्र राजनीति के दौरान वो बेहद ही प्रभावशाली रहे। बताया जाता है कि अपने बेहतरीन भाषण कौशल और रणनीतिक समझ की वजह से वे प्रभावशाली ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के सदस्य बन गए। स्कूली छात्र होने के दौरान ही वे कॉटन कॉलेज में आसू के मुख्य कार्यालय में नियमित रूप से जाया करते थे। 1987 में, 18 साल की उम्र में डिग्री के प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में उन्हें कॉटन कॉलेज का सहायक महासचिव चुना गया। छात्र राजनीति में अपनी गहरी पैठ बनाई और वे 1988-89, 1989-90 और 1991-92 में तीन बार कॉटन कॉलेज छात्र संघ के महासचिव चुने गए।

इस तरह कांग्रेस में हुए शामिल
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) से मतभेद के कारण उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया। इसके बाद तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री की नजर उनपर पड़ी। सरमा ने राज्य भर के छात्रों और कॉलेज यूनियनों के साथ संपर्क बनाकर कांग्रेस को स्थापित करने में सैकिया की काफी मदद की। इसके चलते वे सैकिया के सबसे करीबी युवा नेताओं में शामिल हो गए।

पढ़ें :- पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से लगा बड़ा झटका, हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत पर लगी रोक

यहीं से मुख्यधारा की राजनीति में हिमंत के लिए रास्ता खुला। 1996 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जलुकबारी सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। वे इस चुनाव में हार गए थे। 2001 में उन्होंने जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और अपने पूर्व गुरु और दिग्गज नेता भृगु कुमार फुकन को हराकर पहली बार विधायक बने। इसके बाद वे 2006 और 2011 में भी अपने मतों का अंतर बढ़ाते हुए लगातार जीत दर्ज करते रहे।

कांग्रेस में सरमा का पतन 2011 के आसपास शुरू हुआ। दरअसल, सरमा युवा विधायकों का एक गुट बनाकर मुख्यमंत्री पद के प्रबल आकांक्षी बन गए थे। दूसरी ओर, तरुण गोगोई अपने बेटे गौरव गोगोई को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में बढ़ावा देने लगे, जिससे दोनों के बीच गहरी दरार आ गई, इसके बाद उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया था।

 

Advertisement