कोलकाता: आज पूरा देश एक महान साहित्यकार और देशप्रेमी बंकिम चन्द्र चटर्जी की पुण्यतिथि मना रहा है। आज ही के दिन 1894 में भारतीय साहित्य के इस ‘सूर्य’ का अस्त हुआ था, लेकिन उनके द्वारा रचित शब्दों की गूंज आज भी हर भारतीय के रगों लहू बनकर दौड़ती है।
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‘वंदे मातरम’ एक ऐसा गीत जो बना परतंत्र भारत के लिए आजादी का मंत्र। बंकिम चन्द्र चटर्जी का नाम लेते ही सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ का स्मरण होता है। उन्होंने इस गीत की रचना 1870 के दशक में की थी, जिसको बाद में उनके कालजयी उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) का हिस्सा बना लिया गया। इसके अलावा ब्रिटिश हुकूमत के दौर में यह गीत भारतीय क्रांतिकारियों के लिए शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत बना। लाठी चार्ज हो या फांसी का फंदा, ‘वंदे मातरम’ का नारा हर एक देशभक्तों के होंठों पर हमेशा रहता था। आजादी के बाद, इस गीत के शुरुआती दो पदों को भारत के ‘राष्ट्रीय गीत’ के रूप में अपनाया लिया गया।
‘आनंदमठ’ और सन्यासी विद्रोह
बंकिम चन्द्र जी ने अपने लेखन के जरिए सोए हुए भारत को जगाने का काम किया। उनका उपन्यास ‘आनंदमठ’ 18वीं शताब्दी के सन्यासी विद्रोह पर आधारित है। इस किताब ने न केवल साहित्यिक जगत में हाहाकार मचाई, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने के लिए युवाओं को प्रेरणा भी दी। उनके लेखन में राष्ट्रवाद, भक्ति और समाज सुधार का अनोखा संगम देखने को मिलता है।
प्रशासनिक करियर और साहित्य साधना
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बंकिम चन्द्र चटर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले दो स्नातकों (Graduates) में से एक थे। उन्होंने लंबे समय तक ब्रिटिश सरकार के तहत डिप्टी मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य किया। सरकारी सेवा में रहते हुए भी उन्होंने कभी अपनी कलम को न तो रुकने दी और न ही झुकने दिया। उन्होंने एक ‘बंगदर्शन’ नामक पत्रिका शुरू करके बंगाली साहित्य में एक नई क्रांति की मशाल जला दी।
प्रमुख कृतियां (Literary Legacy): बंकिम चन्द्र को ‘साहित्य सम्राट’ कहा जाता है। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित हैं:
दुर्गेशनन्दिनी: उनका पहला बंगाली उपन्यास (1865)।
कपालकुण्डला: एक रहस्यमयी और प्रेम आधारित रचना।
देवी चौधुरानी: महिला सशक्तिकरण और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष की कहानी।
राजमोहन की पत्नी (Rajmohan’s Wife): उनका पहला और एकमात्र अंग्रेजी उपन्यास।
आज का दिन: (बलिदान और प्रेरणा का संगम)- आज 8 अप्रैल का दिन भारतीय इतिहास में दो महान नायकों के लिए जाना जाता है। आज ही के दिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक मंगल पांडे को फांसी दी गई थी, और आज ही के दिन साहित्य के जरिए राष्ट्रवाद का प्रकाश फ़ैलाने वाले बंकिम चन्द्र चटर्जी का निधन हुआ था।
बंकिम चन्द्र चटर्जी केवल एक लेखक नहीं थे, वे एक ऋषि थे जिन्होंने भारत को ‘भारत माता’ के रूप में देखना सिखाया। उनकी पुण्यतिथि पर सम्पूर्ण देश उन्हें सादर नमन करता है।
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रिपोर्ट : सुशील कुमार साह