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चुनाव आयोग देश और लोकतंत्र के लिए कैंसर बन चुका है : तेजस्वी यादव

By Abhimanyu 
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Election Commission Rift : मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों चुनाव आयोग में कथित मतभेदों और SIR को लेकर चल रही बहस की वजह से चर्चा में हैं। जिसको लेकर विपक्ष, भाजपा और ज्ञानेश कुमार पर हमलावर है। विपक्ष के नेता ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इस कड़ी में बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने रविवार को कहा कि चुनाव आयोग देश और लोकतंत्र के लिए कैंसर बन चुका है।

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आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, “लगातार 6 साल से कह रहा हूँ कि चुनाव आयोग देश और लोकतंत्र के लिए कैंसर बन चुका है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की जमीन पर कहीं कोई लोकप्रियता नहीं है। गोदी मीडिया के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स खरीद, ये केवल मैच रेफ़री और अंपायर को फिक्स कर बेईमानी से चुनावी मैच जीत रहे है। खेल के नियम, फेयर प्ले, दर्शक, खेल और खिलाड़ियों से इनका कोई लेना-देना नहीं होता।”

तेजस्वी ने आगे कहा, “अगर जनता की मदद से चुनाव जीतते तो विजयी राज्यों में जनाधार वाले भाजपाई नेताओं को मुख्यमंत्री बनाते? राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, बिहार, बंगाल इत्यादि राज्यों में इन्होंने Selected कठपुतली ही CM बनाए है क्योंकि मोदी-शाह जानते है कि इन्होंने इन राज्यों में चुनाव आयोग के अटूट समर्थन और अपार सहयोग से ही कथित जीत हासिल की है ना कि जनसर्मथन से!”

क्या है पूरा विवाद?

दरअसल, भारत चुनाव आयोग तीन लोगों से मिलकर बनता है जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा, दो चुनाव आयुक्त भी होते हैं और ये तीनों मिलकर फैसले लेते हैं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक जांच से पता चला है कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं। कमिश्नर सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी का आरोप है कि अहम फैसले उनकी जानकारी या मंज़ूरी के बिना लिए गए। यह अंदरूनी मतभेद ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) पर केंद्रित है, जिसका असर 13 करोड़ मतदाताओं के नामों पर पड़ रहा है। चुनाव आयुक्तों ने नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए ‘फॉर्म 6’ में किए गए ‘अनधिकृत और गैर-कानूनी’ बदलावों को चुनौती दी और IT डिवीज़नों के ज़रिए वोटर लिस्ट डेटाबेस के “धीरे-धीरे सेंट्रलाइज़ेशन” को लेकर चिंताएँ जताई गई हैं।

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