नई दिल्ली। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जो देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं को आयोजित कराती हैं हाल के दिनों में तीखे सवालों के घेरे में हैं। यह एजेंसी जो देश के करोड़ों छात्रों का भविष्य तय करती है, अब इसकी तुलना संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) से की जा रही है। विशेषज्ञों और छात्रों द्वारा लगातार यह सवाल उठाए जा रहे है कि NTA भी UPSC की तरह साख और विश्वसनीयता हासिल क्यों नहीं कर पा रही है?
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इस विवाद के मुख्य कारण:
संघ लोक सेवा आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत गठित एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था (Constitutional Body) है जबकि NTA सिर्फ सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत केवल 50 रूपये की मामूली फीस में रजिस्टर्ड की गई एक सरकारी एजेंसी है। यह कोई संवैधानिक या वैधानिक निकाय नहीं है। इसी अंतर के चलते दोनों की शक्तियों और जवाबदेही में काफी फर्क है। UPSC अपनी परीक्षाओं के प्रत्येक चरण को बहुत ही गोपनीयता से रखता है। यह आयोग अपने प्रश्नपत्र तैयार करने के साथ—साथ परीक्षा केंद्रों का चयन भी खुद ही करता है। वहीं दुसरी ओर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी अपनी परीक्षा को कराने के लिए प्राईवेट सेंटर्स और बाहरी वेंडर्स पर निर्भर रहती है। इसी आउटसोर्सिंग मॉडल के कारण पेपर लीक और तकनीकी गड़बड़ियों का खतरा सबसे ज्यादा बना रहता है।
NTA का गठन साल 2018 में हुआ था। नया संगठन होने के साथ ही यह निजी टेक कंपनियों के इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षा मंत्रालय के निर्देशों पर निर्भर है जिसके चलते इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते है। जबकि UPSC का गठन 1926 में हुई थी और इसके पास अपने सख्त नियम, कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल और दशकों का प्रशासनिक अनुभव है। हालिया विवादों से छात्रों का भरोसा टूट गया है और पिछले कुछ समय में NEET-UG, UGC-NET और CSIR-NET जैसी देश की बड़ी और प्रतिष्ठित परीक्षाओं में पेपर लीक, ग्रेस मार्क्स विवाद और धांधली के आरोपों ने NTA की विश्वसनीयता को पूरी तरह से डगमगा कर रख दिया है। विपक्ष से लेकर आम जनता तक का कहना है कि सिर्फ एक सोसायटी के भरोसे देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य छोड़ना बहुत ही भयानक है।
रिपोर्ट: सुशील कुमार साह