लाइफस्टाइल डेस्क, लखनऊ। आमतौर पर लोग साफ और पारदर्शी दिखाई देने वाले पानी को सुरक्षित मान लेते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक सिर्फ पानी का साफ दिखना सुरक्षा की गारंटी नहीं है। पानी में ऐसे रसायन मौजूद हो सकते हैं जो आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन लंबे समय तक शरीर में पहुंचने पर स्वास्थ्य को हानि पहुंचा सकते है।
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पानी में मौजूद आर्सेनिक, कुछ औद्योगिक रसायन और PFAS जैसे ‘फॉरएवर केमिकल्स’ इसी वजह से चिंता का विषय हैं। कुछ PFAS रसायनों को कैंसर समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है। वहीं, लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी पीने से फेफड़े, मूत्राशय और त्वचा के कैंसर का जोखिम बढ़ने के प्रमाण मिले हैं।
साफ पानी में कैसे छिपा खतरा?
बता दें कि पानी में मौजूद कई रसायन रंग, गंध या स्वाद में कोई खास बदलाव नहीं करते। इसलिए केवल आंखों से देखकर यह पता लगाना संभव नहीं होता कि पानी पीने योग्य है या नहीं। इसके लिए वैज्ञानिक परीक्षण बहुत जरूरी होता है।
खासतौर पर विशेषज्ञों की चिंता उन रसायनों को लेकर है जो पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं। PFAS को इसी वजह से ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है। इनका इस्तेमाल कई औद्योगिक और उपभोक्ता उत्पादों में किया गया है और इनके संपर्क को कैंसर सहित कई स्वास्थ्य प्रभावों से जोड़ा गया है।
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66 साल पुराने नियम का दावा कितना सही?
यहां सबसे गौर करनेवाली बात यह है कि “66 साल पुराने नियम कैंसर का खतरा बढ़ा रहे हैं” वाला दावा इस रूप में सीधे प्रमाणित नहीं होता। उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में 66 साल पुराने किसी एक ऐसे पेयजल नियम की पुष्टि नहीं मिली, जिसे सीधे कैंसर बढ़ने का कारण बताया जा सके।
1958 में बने थे पुराने नियम
एक्सपर्ट्स के अनुसार, साल 1958 में पीने के पानी में नाइट्रेट के स्वीकार्य स्तर को साल तय किया गया था। इसके मुताबिक, पानी में नाइट्रेट की सीमा 50 मिलीग्राम प्रति लिटर निर्धारित की गई थी। उस समय बच्चों में होने वाले ब्लू बेबी सिंड्रोम को ध्यान में रखकर तय किए गए थे।आपको बता दें कि ब्लू बेबी सिंड्रोम एक खतरनाक स्थिति है, जिसमें ब्लड की ऑक्सीजन कैरी करने की क्षमता कम हो जाती है। ऑक्सीजन की कमी के कारण त्वचा का रंग नीला पड़ने लगता है, जो जानलेवा भी साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: साफ दिखाई देने वाला पानी हमेशा रसायन-मुक्त हो, यह जरूरी नहीं। पानी की वास्तविक सुरक्षा जानने के लिए वैज्ञानिक जांच और निर्धारित गुणवत्ता मानकों का पालन जरूरी है।