देश में लोकतंत्र (Democracy) की सबसे बड़ा ताकत- ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ है, लेकिन अक्सर हम खबरों में सुनते हैं कि ‘मेरा वोट कोई और डाल गया’ या ‘फर्जी वोटिंग’ (Bogus Voting) के कारण चुनाव के नतीजे प्रभावित हुए।
नई दिल्ली। देश में लोकतंत्र (Democracy) की सबसे बड़ा ताकत- ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ है, लेकिन अक्सर हम खबरों में सुनते हैं कि ‘मेरा वोट कोई और डाल गया’ या ‘फर्जी वोटिंग’ (Bogus Voting) के कारण चुनाव के नतीजे प्रभावित हुए। लेकिन अब इन समस्याओं का स्थायी इलाज होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए हामी भर दी है, जो भारतीय चुनाव प्रणाली (Indian Electoral System) का चेहरा हमेशा के लिए बदल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस
चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI Justice Surya Kant) और जस्टिस जोयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) की पीठ ने वकील अश्विनी उपाध्याय (Advocate Ashwani Upadhyay) के तरफ से दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग (CIC) को नोटिस जारी किया है। अदालत इस बात की जांच करेगी कि क्या वोट डालने से पहले मतदाता की पहचान बायोमेट्रिक (अंगूठे का निशान या पुतली का स्कैन) और फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचान तकनीक) के जरिए करना संभव है।
यह प्रस्ताव बेहद गंभीर है और चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता बनाए रखने के लिए इस पर विचार करना जरूरी
सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह प्रस्ताव बेहद गंभीर है और चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता बनाए रखने के लिए इस पर विचार करना जरूरी है। हालांकि, कोर्ट ने कड़वी सच्चाई बताते हुए कहा कि यह व्यवस्था रातों-रात लागू नहीं की जा सकती। इसके लिए मौजूदा नियमों में बड़े बदलाव करने होंगे और भारी-भरकम बजट की भी जरूरत होगी।
आम आदमी के लिए क्यों है यह जरूरी?
अक्सर वोटर लिस्ट में घोस्ट वोटर्स (मृत या फर्जी लोग) के नाम होते हैं, जिनका फायदा उठाकर असामाजिक तत्व फर्जी वोटिंग करते हैं। वर्तमान में हम सिर्फ वोटर आईडी कार्ड और उंगली पर लगी स्याही पर भरोसा करते हैं, जिसमें हेराफेरी की गुंजाइश बनी रहती है। लेकिन नई तकनीक आने से कम से इन पर तो लगाम लगेगा-
आपका चेहरा और अंगूठे का निशान पूरी दुनिया में सिर्फ आपका है। कोई और आपकी जगह वोट नहीं डाल पाएगा। हर वोट का एक डिजिटल और रियल-टाइम ऑडिट ट्रेल होगा। भविष्य में यह तकनीक घर से दूर रहने वाले मतदाताओं के लिए सुरक्षित वोटिंग की राह भी खोल सकती है।
जानें अभी क्यों नहीं लागू हो सकता?
अदालत ने साफ किया कि आगामी चुनावों में इसे लागू करना संभव नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि चुनाव आयोग सहमत भी हो जाए, तो वित्त मंत्रालय से बजट पास कराना और राज्य सरकारों का सहयोग लेना एक लंबी प्रक्रिया है। कोर्ट ने कहा कि ‘हम इस पर विचार करेंगे कि क्या अगले संसदीय चुनावों या विधानसभा चुनावों के लिए ऐसा रास्ता अपनाया जा सकता है।
जब हम बैंक खाता खोलने से लेकर सिम कार्ड लेने तक के लिए बायोमेट्रिक का इस्तेमाल , तो सरकार चुनने में इसका उपयोग क्यों नहीं ?
याचिका में तर्क दिया गया है कि जब हम बैंक खाता खोलने से लेकर सिम कार्ड लेने तक के लिए बायोमेट्रिक का इस्तेमाल कर सकते हैं, तो देश की सरकार चुनने के लिए इसका उपयोग क्यों नहीं होना चाहिए? इसे आधार आधारित पहचान प्रणाली से जोड़कर चुनाव को पूरी तरह ‘हैकर-प्रूफ’ और ‘फ्रॉड-प्रूफ’ बनाया जा सकता है।