सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एसआईआर से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर कड़ी नाराजगी जताई। इसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister Mamata Banerjee) ने मालदा की घटना से खुद को अलग कर लिया है।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एसआईआर से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर कड़ी नाराजगी जताई। इसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister Mamata Banerjee) ने मालदा की घटना से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने कहा कि कानून और व्यवस्था अब उनके हाथों में नहीं है और अधिकारियों की सुरक्षा करने में विफल रहने के लिए चुनाव आयोग को दोषी ठहराया।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister Mamata Banerjee) ने कहा कि मुझे नहीं पता कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। मुझे किसी ने सूचित नहीं किया। प्रशासन मेरे हाथ में नहीं है। राज्य में कानून व्यवस्था चुनाव आयोग (EC) के हाथ में है। वे गृह मंत्री अमित शाह की बात सुनते हैं। सब कुछ बदल गया है। मेरी शक्तियां चुनाव आयोग (EC) को सौंप दी गई हैं। यह ‘सुपर राष्ट्रपति शासन’ है।
सीएम बनर्जी ने कहा कि चुनाव आयोग (EC) कानून और व्यवस्था को कंट्रोल करने में पूरी तरह विफल रहा है। सीएम ने कहा, कि मेरी सारी शक्तियां छीन ली गई हैं। मुर्शिदाबाद जिले में एक चुनावी रैली में मुख्यमंत्री ने कहा,कि मुझे (बंधकों के बारे में) आधी रात को एक पत्रकार से पता चला। उन्होंने आगे कहा, कि लेकिन मैं समझती हूं कि लोग क्यों नाराज हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर की नाराजगी
बता दें कि पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट में नाम हटाए जाने से नाराज लोगों ने सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया और आज सुबह इस पर सुनवाई की। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पश्चिम बंगाल में हर कोई केवल राजनीतिक भाषा बोलता है। मुख्य न्यायाधीश कांत ने पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता से कहा कि यह सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, कि यह घटना न केवल न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने का एक घिनौना प्रयास है, बल्कि इस न्यायालय के अधिकार को भी चुनौती देती है। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने और लंबित मामलों में आपत्तियों के निपटारे की चल रही प्रक्रिया को रोकने के लिए सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है। हम किसी को भी हस्तक्षेप करने और न्यायिक अधिकारियों के मन पर मनोवैज्ञानिक हमला करने के लिए कानून को अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं देंगे। यह पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा कर्तव्य का उल्लंघन भी है और अधिकारियों को यह कारण बताना होगा कि सूचना मिलने के बावजूद उन्होंने अधिकारियों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित क्यों नहीं की।